अवध (लखनऊ) के प्रमुख नवाबों की सूची और विश्लेषण

अवध (लखनऊ) के प्रमुख नवाबों की सूची और विश्लेषण

अवध के नवाबों का काल 18वीं और 19वीं शताब्दी में अवध रियासत के उत्थान और पतन का प्रतीक है, जो मुगल साम्राज्य के कमजोर होने के साथ एक स्वतंत्र क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभरा।

अवध (लखनऊ) के प्रमुख नवाबों की सूची और विश्लेषण

अवध के नवाबों का शासन 1722 ईस्वी में शुरू हुआ, जब सआदत खान बुरहान-उल-मुल्क को मुगल सम्राट द्वारा अवध का सूबेदार नियुक्त किया गया, और 1856 में अंतिम नवाब वाजिद अली शाह के शासन को अंग्रेजों द्वारा समाप्त करने तक चला।

1. सआदत खान बुरहान-उल-मुल्क (1722 - 1739 ई.)

 * मूल नाम: मीर मोहम्मद अमीन मुसावी।

 * शासनकाल: 1722 से 1739 ई.

 * विश्लेषण:

   * संस्थापक: वह अवध रियासत के संस्थापक थे। उन्होंने मुगल साम्राज्य की कमजोरी का फायदा उठाते हुए अवध को एक स्वायत्त राज्य के रूप में स्थापित किया।

   * प्रशासन: वह एक कुशल प्रशासक और सैन्य रणनीतिकार थे। उन्होंने स्थानीय विद्रोहों को सफलतापूर्वक दबाया और राजस्व प्रशासन में सुधार किया, जिससे राज्य की वित्तीय स्थिति मजबूत हुई।

   * राजनीति: उन्होंने अपनी शक्ति को मजबूत करने के लिए जागीरदारों के प्रभाव को कम करने की रणनीति अपनाई।

   * मृत्यु: नादिर शाह के आक्रमण (1739) के बाद की परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हुई। कुछ इतिहासकारों के अनुसार उन्होंने जहर खाकर आत्महत्या कर ली थी।

   * योगदान: उन्होंने फैजाबाद को अपनी पहली राजधानी बनाया, जो बाद में अवध की एक महत्वपूर्ण सीट बनी।

2. सफदरजंग (अबुल मंसूर खान) (1739 - 1754 ई.)

 * मूल नाम: अबुल मंसूर मोहम्मद मुकीम खान।

 * शासनकाल: 1739 से 1754 ई.

 * विश्लेषण:

   * उत्तराधिकारी: वह सआदत खान के दामाद और उत्तराधिकारी थे।

   * मुगल वज़ीर: उन्हें मुगल सम्राट अहमद शाह द्वारा 1748 में साम्राज्य के वज़ीर (प्रधानमंत्री) के रूप में नियुक्त किया गया था, जिससे अवध की प्रतिष्ठा और शक्ति में वृद्धि हुई।

   * सैन्य और राजनीतिक संघर्ष: उनके शासनकाल में फर्रुखाबाद के बंगश पठानों और मराठा संघ के साथ निरंतर संघर्ष रहा।

   * योगदान: उन्होंने फैजाबाद को सैन्य मुख्यालय के रूप में विकसित किया। उनके नाम पर दिल्ली में सफदरजंग का मकबरा एक महत्वपूर्ण वास्तुकला विरासत है।

3. शुजा-उद-दौला (1754 - 1775 ई.)

 * शासनकाल: 1754 से 1775 ई.

 * विश्लेषण:

   * राजनीतिक भूमिका: उन्होंने 1761 के पानीपत के तीसरे युद्ध में अहमद शाह अब्दाली का साथ दिया था।

   * बक्सर का युद्ध (1764): वह मीर कासिम (बंगाल के अपदस्थ नवाब) और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के साथ मिलकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध बक्सर के युद्ध में लड़े, जिसमें उनकी हार हुई।

   * इलाहाबाद की संधि (1765): इस हार के कारण उन्हें अंग्रेजों के साथ एक संधि करनी पड़ी, जिसने अवध को अंग्रेजों के प्रभाव में ला दिया। उन्हें हर्जाने के तौर पर बड़ी राशि चुकानी पड़ी, और ब्रिटिश सेना अवध की सुरक्षा के लिए तैनात की गई, जिसका खर्च नवाब को उठाना था।

   * योगदान: उन्होंने फैजाबाद को एक पूर्ण राजधानी शहर के रूप में विकसित किया और यहाँ कई भव्य इमारतें बनवाईं।

4. आसफ-उद-दौला (1775 - 1797 ई.)

 * शासनकाल: 1775 से 1797 ई.

 * विश्लेषण:

   * राजधानी परिवर्तन: उन्होंने अवध की राजधानी को फैजाबाद से लखनऊ स्थानांतरित किया। इसी के साथ लखनऊ अवध के नवाबी शासन का केंद्र बना और उसकी समृद्धि शुरू हुई।

   * वास्तुकला और संस्कृति: उनका शासनकाल लखनऊ की कला और संस्कृति के स्वर्ण युग के रूप में जाना जाता है। उन्होंने स्थापत्य कला को अभूतपूर्व संरक्षण दिया।

   * प्रमुख निर्माण: उन्होंने बड़ा इमामबाड़ा (जिसमें भूलभुलैया है) और रूमी दरवाजा जैसे शानदार और विशाल स्मारक बनवाए।

   * प्रशासन: उनके शासनकाल में भी अंग्रेजों का हस्तक्षेप बढ़ता गया। उन्होंने 1775 में फैजाबाद की संधि पर हस्ताक्षर किए, जिससे नवाब और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच संबंध और मजबूत हुए।

   * सामाजिक भावना: उन्हें उनकी उदारता और 'जिसको न दे मौला, उसको दे आसफुद्दौला' (जिसे ईश्वर भी न दे, उसे आसफुद्दौला देता है) की कहावत के लिए जाना जाता था, जो उनके धर्मार्थ स्वभाव को दर्शाती है।

5. सआदत अली खान द्वितीय (1798 - 1814 ई.)

 * शासनकाल: 1798 से 1814 ई.

 * विश्लेषण:

   * ब्रिटिश प्रभाव: वे अंग्रेजों की सहायता से नवाब बने और बदले में उन्होंने अंग्रेजों को भारी आर्थिक और क्षेत्रीय रियायतें दीं।

   * क्षेत्रीय रियायतें: उन्होंने 1801 की संधि के तहत अवध राज्य के लगभग आधे क्षेत्र को अंग्रेजों को सौंप दिया, जिससे अवध की भौगोलिक सीमाएँ और शक्ति कम हो गई।

   * प्रशासन: उन्होंने अपने राज्य की वित्तीय स्थिति में सुधार किया।

6. गाज़ी-उद-दीन हैदर शाह (1814 - 1827 ई.)

 * शासनकाल: 1814 से 1827 ई.

 * विश्लेषण:

   * बादशाह का खिताब: वह अवध के पहले शासक थे जिन्होंने 1819 में अंग्रेजों के प्रोत्साहन पर 'नवाब वज़ीर' के बजाय 'बादशाह' (किंग) की उपाधि धारण की। यह कदम प्रतीकात्मक रूप से मुगल सम्राट से उनकी स्वतंत्रता को दर्शाता था, लेकिन वास्तव में यह अंग्रेजों पर उनकी बढ़ती निर्भरता का प्रतीक था।

   * वास्तुकला: उन्होंने मोती महल परिसर के भीतर मुबारक मंज़िल और शाह मंज़िल जैसी संरचनाओं का निर्माण करवाया।

7. वाजिद अली शाह (1847 - 1856 ई.)

 * शासनकाल: 1847 से 1856 ई.

 * विश्लेषण:

   * अंतिम शासक: वह अवध के अंतिम नवाब (बादशाह) थे।

   * कला और संस्कृति: वह कला, संगीत, नृत्य और साहित्य के महान संरक्षक थे। उन्होंने 'अख्तर पिया' के उपनाम से कई पुस्तकें लिखीं। उनके दरबार में कलाकारों को भारी संरक्षण मिला, और लखनऊ शास्त्रीय संगीत तथा नृत्य का एक प्रमुख केंद्र बन गया। उन्होंने कथक नृत्य को भी प्रोत्साहित किया।

   * कैसरबाग: उन्होंने भव्य कैसरबाग महल परिसर का निर्माण शुरू कराया।

   * राजगद्दी से हटना: लॉर्ड डलहौज़ी ने कुशासन का आरोप लगाते हुए 1856 में अवध पर कब्ज़ा कर लिया (विलय नीति)। वाजिद अली शाह ने अंग्रेजों के 'नाममात्र के राजा' बनने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और उन्हें कलकत्ता निर्वासित कर दिया गया, जहाँ उनकी मृत्यु हुई।

   * 1857 का विद्रोह: अवध के विलय ने जनता और सैनिकों में भारी आक्रोश पैदा किया, जो 1857 के विद्रोह के प्रमुख कारणों में से एक बना। उनकी बेगम हज़रत महल ने विद्रोह के दौरान लखनऊ में ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

निष्कर्ष

लखनऊ के नवाबों का शासनकाल (अवध रियासत) राजनीतिक रूप से अंग्रेजों के बढ़ते प्रभाव के कारण कमजोर होता गया, लेकिन यह गंगा-जमुनी तहज़ीब (हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति का मिश्रण), शानदार वास्तुकला, उत्कृष्ट संगीत, नृत्य और अदबी (साहित्यिक) माहौल के लिए भारतीय इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ गया।

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