कूच बिहार का एक व्यापक इतिहास

कूच बिहार का एक व्यापक इतिहास

कूच बिहार का एक व्यापक इतिहास (A Comprehensive History of Cooch Behar)

कूच बिहार, जो वर्तमान में पश्चिम बंगाल राज्य का एक शहर और ज़िला है, का इतिहास मुख्य रूप से कोच साम्राज्य (शुरुआती चरणों में कामता साम्राज्य के रूप में भी जाना जाता है) के उत्थान, गौरव और अंततः भारतीय संघ में विलय के इर्द-गिर्द घूमता है। यह अविभाजित बंगाल की एकमात्र रियासत थी, जिसने सदियों की उथल-पुथल के बावजूद अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखी, जब तक कि वह स्वतंत्र भारत में विलीन नहीं हो गई।

कूच बिहार के इतिहास को मोटे तौर पर चार प्रमुख अवधियों में विभाजित किया जा सकता है: कोच राजवंश का उदय और साम्राज्य का चरमोत्कर्ष, मुग़ल और भूटानी संघर्षों और पतन का दौर, एक ब्रिटिश रियासत के रूप में सुदृढ़ीकरण, और अंत में, भारतीय संघ में एकीकरण।

I. कोच साम्राज्य का उद्गम और चरमोत्कर्ष (c. 1515 – 1587 ईस्वी)

पूर्ववर्ती काल: कामरूप और खेन राजवंश

वर्तमान कूच बिहार क्षेत्र की प्राचीन ऐतिहासिक जड़ें हैं, जो पौराणिक प्राग्ज्योतिष और बाद में कामरूप साम्राज्य का हिस्सा था। 15वीं शताब्दी तक, कामरूप के पश्चिमी भाग पर खेन राजवंश का शासन था, जिसका साम्राज्य कामता कामतापुर में केंद्रित था। सन् 1498 ईस्वी के आस-पास गौर (बंगाल) के सुल्तान अलाउद्दीन हुसैन शाह के आक्रमण के बाद खेन राजा नीलामबर के पतन ने इस क्षेत्र में एक राजनीतिक शून्य पैदा कर दिया।

विश्व सिंह का उदय और कोच राजवंश की स्थापना

इस राजनीतिक शून्य का लाभ एक करिश्माई स्थानीय नेता हरिया मंडल ने उठाया, जो चिकना पहाड़ियों में मेच (एक तिब्बत-बर्मी जनजाति) या कोच समुदाय का सरदार था। उनका पुत्र, बिसू, स्थानीय सरदारों और जनजातीय समूहों (कोच और मेच) को अपने अधीन एकजुट करके उभरा।

लगभग 1515 ईस्वी में, बिसू ने एक स्वतंत्र साम्राज्य की स्थापना की, और महाराजा विश्व सिंह (शासनकाल लगभग 1515–1540 ईस्वी) का नाम अपनाया। इसने गौरवशाली कोच राजवंश की नींव रखी। विश्व सिंह ने शुरू में कामतापुर के आसपास केंद्रित एक विशाल क्षेत्र पर अपना शासन मजबूत किया। उन्होंने अपने व्यापक क्षेत्र की आबादी के बीच अपने शासन को वैध बनाने के लिए हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं को अपनाया, जो कोच लोगों का राजबंशी समुदाय में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवर्तन था।

नर नारायण और चिलराय के अधीन स्वर्ण युग

कोच साम्राज्य का वास्तविक चरमोत्कर्ष विश्व सिंह के पुत्र, महाराजा नर नारायण (शासनकाल लगभग 1540–1587 ईस्वी) के अधीन पहुँचा। उनके शासनकाल को कूच बिहार के इतिहास का स्वर्ण युग माना जाता है।

 * सैन्य विस्तार: नर नारायण के अभियानों का नेतृत्व उनके छोटे भाई, शुक्लध्वज ने किया, जिन्होंने अपनी बिजली-सी तेज़ सैन्य गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध उपाधि 'चिलराय' (अर्थात् 'चील राजा') अर्जित की। चिलराय ने अहोमों (1562 ईस्वी), गौर के सुल्तानों और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों को पराजित किया, जिससे कोच साम्राज्य का विस्तार पश्चिम में संकोश नदी से लेकर पूर्व में ब्रह्मपुत्र घाटी तक हो गया, जिसमें वर्तमान असम, उत्तरी बंगाल और बांग्लादेश के कुछ हिस्से शामिल थे।

 * सांस्कृतिक संरक्षण: नर नारायण ज्ञान और संस्कृति के महान संरक्षक थे। यह उनके शासनकाल के दौरान था कि प्रसिद्ध असमिया संत और सुधारक शंकरदेव ने कोच दरबार के शाही संरक्षण में अपने कई प्रमुख कार्यों की रचना की, जिसने पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र के धार्मिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को प्रभावित किया।

साम्राज्य का विभाजन

हालांकि, विशाल और शक्तिशाली कोच साम्राज्य एकजुट रहने वाला नहीं था। इसके पतन के बीज 1581 ईस्वी में तब बोए गए जब नर नारायण ने एक राजनीतिक व्यवस्था के तहत साम्राज्य को विभाजित कर दिया।

 * कोच बिहार: संकोश नदी के पश्चिम में स्थित पश्चिमी भाग को नर नारायण ने अपने पास रखा और बाद में उनके पुत्र लक्ष्मी नारायण को विरासत में मिला। यह हिस्सा वह रियासत बन गया जो अंततः आधुनिक कूच बिहार में बदल गया।

 * कोच हाजो: संकोश और भरेली नदियों के बीच का पूर्वी भाग चिलराय के पुत्र रघुदेव को दिया गया। इस विभाजन ने समग्र कोच शक्ति संरचना को काफी कमज़ोर कर दिया, जिससे दोनों भाग बाहरी खतरों के प्रति संवेदनशील हो गए।

II. संघर्ष, विखंडन और भेद्यता का दौर (1587 – 1773 ईस्वी)

सन् 1587 ईस्वी में नर नारायण की मृत्यु के बाद, कूच बिहार का इतिहास बढ़ती हुई बाहरी शक्तियों: मुगल साम्राज्य और भूटान के धर्म राजाओं के खिलाफ एक अस्तित्व की लड़ाई बन गया।

मुग़ल आक्रमण और संप्रभुता का ह्रास

यह विभाजन तब हुआ जब मुग़ल साम्राज्य, सम्राट अकबर और बाद में जहाँगीर के अधीन, पूर्व में तेज़ी से विस्तार कर रहा था। कोच बिहार के शासक लक्ष्मी नारायण (शासनकाल 1587–1621 ईस्वी) मुग़ल दबाव का सामना करने में असमर्थ रहे।

 * अधीनस्थ राज्य का दर्जा: मुग़ल सेनापतियों के लगातार हमलों और क्षेत्रीय नुकसान का सामना करते हुए, लक्ष्मी नारायण मुग़ल संरक्षण की तलाश करने के लिए मजबूर हुए और उनकी संप्रभुता को स्वीकार कर लिया, जिससे यह एक अधीनस्थ राज्य बन गया। इसने कूच बिहार की स्वतंत्र शाही स्थिति के आधिकारिक अंत को चिह्नित किया।

 * क्षेत्रीय संकुचन: मुग़लों ने धीरे-धीरे कोच क्षेत्र के बड़े हिस्सों पर कब्ज़ा कर लिया। उदाहरण के लिए, 1661 ईस्वी में, महाराजा प्राण नारायण के शासनकाल के दौरान, बंगाल के मुग़ल सूबेदार मीर जुमला ने संक्षेप में कूच बिहार पर विजय प्राप्त की, और राजधानी का नाम बदलकर आलमगीरनगर रख दिया। हालांकि प्राण नारायण कुछ ही दिनों में नियंत्रण हासिल करने में सफल रहे, लेकिन साम्राज्य की शक्ति और विस्तार स्थायी रूप से कम हो गए।

भूटानी प्रभाव का उदय

18वीं शताब्दी की शुरुआत में जैसे-जैसे मुग़लों की शक्ति कम होती गई, उत्तर से एक और खतरा उभरा: भूटानी (भूतिया)। दशकों से, गठबंधनों और आक्रामकता दोनों के माध्यम से भूटानी प्रभाव ने कूच बिहार की राजनीति पर हावी होना शुरू कर दिया।

 * अस्थिरता और अपहरण: राजनीतिक स्थिति अत्यधिक अस्थिर थी। महाराजा धरजेन्द्र नारायण के शासनकाल के दौरान, भूटानी सेना इतनी शक्तिशाली हो गई कि उसने सीधे हस्तक्षेप किया, जिससे भूटानी राजा द्वारा महाराजा का अपहरण कर लिया गया। इस अवधि में कूच बिहार प्रभावी रूप से भूटान का एक जागीरदार राज्य बन गया, जिसके आंतरिक मामलों को अक्सर उसके हिमालयी पड़ोसी द्वारा निर्देशित किया जाता था।

III. ब्रिटिश संरक्षण और रियासत का युग (1773 – 1947 ईस्वी)

भूटानी प्रभुत्व कूच बिहार के इतिहास में अगले प्रमुख मोड़ का उत्प्रेरक बना: ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रवेश।

1773 की एंग्लो-कोच संधि

1772 में, महाराजा धैर्येंद्र नारायण के मंत्री ने, भूटानी दबाव में साम्राज्य के पूर्ण पतन का सामना करते हुए, कलकत्ता (कोलकाता) से काम कर रही ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से सहायता की अपील की।

 * हस्तक्षेप: बंगाल के पहले गवर्नर-जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने कंपनी की सेना को कूच बिहार भेजा। संयुक्त सेनाओं ने सफलतापूर्वक भूटानियों को खदेड़ दिया, और महाराजा को मुक्त कराया।

 * संधि: इसके बाद हुई 1773 की एंग्लो-कोच संधि ने कूच बिहार की नई स्थिति को औपचारिक रूप दिया। इसकी शर्तों के तहत, कूच बिहार ब्रिटिशों का एक जागीरदार राज्य बन गया, जिसने सैन्य सुरक्षा और आंतरिक स्वायत्तता के बदले कंपनी को वार्षिक श्रद्धांजलि (शुरुआत में राज्य के राजस्व का आधा) देने पर सहमति व्यक्त की। इस संधि ने राज्य के अस्तित्व की गारंटी दी, जिससे कभी का शक्तिशाली साम्राज्य ब्रिटिश राज के अधीन एक संरक्षित रियासत में बदल गया।

आधुनिकीकरण और विकास

19वीं शताब्दी में महाराजा नृपेंद्र नारायण भूप बहादुर (शासनकाल 1863–1911 ईस्वी) के अधीन आधुनिकीकरण का एक महत्वपूर्ण चरण देखा गया। पश्चिमी शिक्षा प्राप्त करने के बाद, महाराजा ने वयस्क होने पर तेज़ी से विकास किया, जिससे कूच बिहार ने दक्षिण एशिया की सबसे उन्नत मूल रियासतों में से एक के रूप में प्रतिष्ठा अर्जित की।

 * प्रशासन और बुनियादी ढाँचा: राज्य के प्रशासन, न्यायपालिका और राजस्व प्रणालियों में ब्रिटिश मॉडल पर सुधार किए गए।

 * वास्तुशिल्प विरासत: उन्होंने शानदार संरचनाओं के निर्माण का आदेश दिया, जिनमें प्रतिष्ठित कूच बिहार पैलेस (बकिंघम पैलेस के समान शास्त्रीय यूरोपीय शैली पर आधारित), प्रशासनिक भवन, पुस्तकालय और क्लब शामिल थे, जिसने राजधानी को एक आधुनिक शहर में बदल दिया।

 * सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन: महाराजा नृपेंद्र नारायण का विवाह प्रसिद्ध ब्रह्म समाज नेता केशव चंद्र सेन की बेटी महारानी सुनीति देवी से हुआ, जो एक निर्णायक क्षण था। सुनीति देवी ने महिला शिक्षा और सामाजिक सुधारों की वकालत की, अंतर्राष्ट्रीय पहचान हासिल की और विदेश यात्रा करने वाली पहली भारतीय रानी बनीं। इस अवधि ने शाही परिवार और राज्य के कुलीन वर्ग में भारतीय और पश्चिमी संस्कृति के मिश्रण को बढ़ावा दिया।

ब्रिटिशों ने कूच बिहार को बंगाल स्टेट्स एजेंसी के अधीन रखा, और बाद में ईस्टर्न स्टेट्स एजेंसी के अधीन, 13 तोपों की सलामी के साथ एक प्रमुख रियासत के रूप में इसकी स्थिति की पुष्टि की।

IV. भारतीय संघ में एकीकरण (1947 ईस्वी से आगे)

कूच बिहार की सदियों पुरानी स्वतंत्र पहचान का इतिहास भारत की स्वतंत्रता के साथ समाप्त हो गया।

विलय और एकीकरण

1947 के भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के साथ, रियासतों पर ब्रिटिश सर्वोपरिता समाप्त हो गई। कूच बिहार के अंतिम शासक महाराजा जगद्दीपेन्द्र नारायण (शासनकाल 1922–1949) ने नव स्वतंत्र भारतीय संघ में शामिल होने का फैसला किया।

 * विलय पत्र (अगस्त 1947): शुरू में, महाराजा ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए, जिससे डोमिनियन सरकार को रक्षा, विदेश मामलों और संचार पर नियंत्रण मिला।

 * विलय समझौता (अगस्त 1949): विभाजन के बाद प्रशासनिक और राजनीतिक चुनौतियों के कारण, और क्षेत्र की दीर्घकालिक स्थिरता और विकास को ध्यान में रखते हुए, महाराजा ने बाद में 20 अगस्त, 1949 को एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसमें राज्य के "पूर्ण और विशेष अधिकार, क्षेत्राधिकार और शक्ति" भारत सरकार को सौंप दिए गए।

 * प्रशासन का हस्तांतरण (सितंबर 1949): कूच बिहार का प्रशासन आधिकारिक तौर पर 12 सितंबर, 1949 को भारत सरकार को हस्तांतरित कर दिया गया, और इसे मुख्य आयुक्त के प्रांत के रूप में शासित किया गया।

पश्चिम बंगाल में विलय

अंतिम राजनीतिक एकीकरण 1950 में हुआ। 1 जनवरी, 1950 को, कूच बिहार को औपचारिक रूप से पश्चिम बंगाल राज्य में विलय कर दिया गया, जिससे यह राज्य का कूच बिहार ज़िला बन गया। सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा लिया गया यह निर्णय भौगोलिक निकटता और प्रशासनिक सुविधा पर आधारित था, जिसने कोच राजवंश के 435 वर्षों के शासन को समाप्त कर दिया और क्षेत्र को पूरी तरह से आधुनिक भारतीय गणराज्य में एकीकृत कर दिया।

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