शेर की छाया: जावली की विजय

शेर की छाया: जावली की विजय

​साल 1656 था। छत्रपति शिवाजी, जिनकी उम्र मुश्किल से पच्चीस थी, ने सह्याद्री के बीहड़ पहाड़ों में अपना नाम बनाना शुरू कर दिया था। फिर भी, एक क्षेत्र उनके लिए एक दुर्गम काँटा बना रहा: जावली, एक विशाल, घना और प्राकृतिक रूप से क़िलेबंद इलाक़ा, जिस पर चंद्र राव मोरे नामक एक शक्तिशाली और अहंकारी सरदार का शासन था।

​चंद्र राव मोरे ख़ुद को एक राजा मानता था, जिसके पास 'राजा' की उपाधि थी और वह एक दुर्जेय सेना को नियंत्रित करता था, जिसमें प्रसिद्ध हिरदस मावल पैदल सैनिक भी शामिल थे। उसने युवा शिवाजी को, जिन्होंने हाल ही में सल्तनतों को चुनौती देना शुरू किया था, पूरी तरह से तुच्छ दृष्टि से देखा, और अक्सर उन्हें महज़ "नया-नया किसान का बेटा" कहकर संदर्भित करता था। मोरे की ताक़त सिर्फ़ उसके आदमियों में ही नहीं थी, बल्कि उसके रणनीतिक स्थान में भी थी—जावली की ओर जाने वाले पहाड़ी रास्ते किसी भी हमलावर सेना के लिए मौत का जाल थे।

​शिवाजी समझते थे कि जावली के बिना, उनके हिंदवी स्वराज्य (स्व-शासन) का सपना अधूरा था, क्योंकि यह क्षेत्र तट के लिए एक महत्त्वपूर्ण कड़ी था और इसमें अपार प्राकृतिक संसाधन थे। हालाँकि, सीधी चढ़ाई करना असंभव था और इससे अनावश्यक रक्तपात होता।

​शिवाजी ने brute force (ज़ोर-ज़बरदस्ती) के बजाय रणनीतिकार का रास्ता चुना। उन्होंने चापलूसी को छिपी हुई धमकी के साथ मिलाकर, धीमे, अथक राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव की नीति अपनाई। सबसे पहले, उन्होंने मोरे को एक विनम्र लेकिन स्पष्ट पत्र भेजा:

​“आप राजा हैं। हम भी राजा हैं। हमें तालमेल से काम करना चाहिए। भूमि की स्वतंत्रता के लिए एकजुट होने का समय आ गया है। अपने सेनापति को मेरे पास भेजिए ताकि हम गठबंधन पर चर्चा कर सकें।”

​मोरे ने अहंकार से फूलकर एक तिरस्कारपूर्ण जवाब भेजा:

​“तुम तो कल के बच्चे हो। जंगल तुम्हारा घर है, बकरी चराने वाले तुम्हारे साथी। तुम्हें ख़ुद को राजा कहने की हिम्मत किसने दी? जावली तुम्हारी साधारण राजनीति के लिए बहुत बड़ा है। ख़ुद आओ, और हम इस 'गठबंधन' के बारे में देखेंगे।”

​यह वही अवसर था जिसकी शिवाजी को तलाश थी। वह समझ गए थे कि मोरे का अहंकार ही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है। शिवाजी ने अपने सबसे आकर्षक और भरोसेमंद दूतों को भेजना शुरू कर दिया, जिनके पास सैनिक नहीं, बल्कि उपहार थे: मिठाइयाँ, बढ़िया कपड़े और सुखद संदेश। इन दूतों को जावली में समय बिताने, क़िलों के लेआउट, सैनिकों की ताक़त, और सबसे महत्त्वपूर्ण, मोरे के रैंकों के भीतर असंतुष्ट अधिकारियों की पहचान करने का निर्देश दिया गया था।

​लगभग एक साल तक, यह भ्रामक दोस्ती जारी रही। शिवाजी ने धैर्यपूर्वक ख़ुफ़िया जानकारी का एक नेटवर्क बनाया और जावली के दिल, रायरी (बाद में रायगढ़) के क़िले के अंदर जासूसों को पाला। वह जानते थे कि सही समय आ गया है जब उन्हें ख़बर मिली कि मोरे का दरबार आत्मसंतुष्ट हो गया है, शिवाजी को सिर्फ़ एक चापलूस मान रहा है, न कि कोई ख़तरा।

​तब शिवाजी ने अपना अंतिम, निर्णायक दाँव चला। उन्होंने अपने "भाईचारे" को अंततः मज़बूत करने के लिए एक शांति शिखर सम्मेलन के लिए एक छोटे दल के साथ जावली का दौरा करने का इरादा घोषित किया। मोरे ने, अपनी शान और श्रेष्ठता प्रदर्शित करने के लिए उत्सुक होकर, तुरंत सहमति दे दी।

​हालाँकि, शिवाजी अकेले नहीं आए थे। उन्होंने जावली की ओर जाने वाले छिपे हुए रास्तों पर हम्बीरराव मोहिते और कान्होजी जेधे की कमान में दो छोटी, उच्च प्रशिक्षित टुकड़ियों को तैनात कर दिया था। उनका अपना साथ देने वाला दल, जो सिर्फ़ मुट्ठी भर अंगरक्षकों जैसा लग रहा था, उसमें उनके कुछ सबसे भरोसेमंद और बहादुर सिपाही शामिल थे।

​यह बैठक एक दिखावा थी। एक पूर्व-व्यवस्थित संकेत पर, शिवाजी के साथ जावली में प्रवेश करने वाले कुछ आदमी कार्रवाई में कूद पड़े। अनजाने गार्डों को बेअसर कर दिया गया, और साथ ही, दोनों छिपी हुई टुकड़ियाँ अंदर घुस गईं, पिछले साल भर में इकट्ठा की गई अंदरूनी जानकारी का उपयोग करके सुरक्षा को दरकिनार कर दिया।

​चंद्र राव मोरे स्तब्ध रह गया। वह अपनी ही घमंड में इतना अंधा हो गया था कि उसने अपने डोमेन में धीरे-धीरे, लगातार रेंगती हुई शेर की छाया को देखने में विफल रहा। वह भागा, लेकिन अंततः पकड़ा गया।

​जावली की विजय, जो brute force (ज़ोर-ज़बरदस्ती) के माध्यम से नहीं, बल्कि रणनीतिक धैर्य, सावधानीपूर्वक ख़ुफ़िया जानकारी जुटाने, और मनोवैज्ञानिक युद्ध के माध्यम से हासिल की गई थी, एक महत्त्वपूर्ण क्षण था। इसने शिवाजी को रायरी क़िले पर कब्ज़ा दे दिया, जिसे उन्होंने बाद में फिर से बनवाया और रायगढ़ नाम दिया—उनके मराठा साम्राज्य की राजधानी—जो महज़ बल के ऊपर मन की शक्ति का एक प्रमाण है।

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