यह महारानी विक्टोरिया और अब्दुल करीम की कहानी है—शाही इतिहास की सबसे असामान्य मित्रता में से एक। यह एक ऐसा बंधन था जिसने ब्रिटिश दरबार में हड़कंप मचा दिया और लगभग एक सदी तक इतिहास के पन्नों में छिपा रहा।
"मुंशी" का आगमन
कहानी 1887 में शुरू होती है, जो महारानी विक्टोरिया की 'गोल्डन जुबली' (स्वर्ण जयंती) का वर्ष था। 68 वर्ष की आयु में, विक्टोरिया भारत की साम्राज्ञी थीं, फिर भी उन्होंने कभी अपने साम्राज्य के इस "ताज के रत्न" का दौरा नहीं किया था। लंदन में भारत की झलक लाने के लिए, शाही मेज पर सेवा करने के लिए दो भारतीय नौकरों को बुलाया गया। उनमें से एक थे अब्दुल करीम, जो आगरा के एक 24 वर्षीय लंबे कद के क्लर्क थे।
महारानी, जो अपने पति अल्बर्ट और अपने करीबी साथी जॉन ब्राउन की मृत्यु के बाद अकेली और दुखी थीं, अब्दुल के व्यवहार से तुरंत प्रभावित हो गईं। उन्होंने अपनी डायरी में अब्दुल को "एक गंभीर और सुंदर चेहरे वाला लंबा व्यक्ति" बताया।
जो काम एक साधारण सेवा के रूप में शुरू हुआ था, वह जल्द ही बदल गया। विक्टोरिया उनकी संस्कृति से मंत्रमुग्ध थीं। कुछ ही हफ्तों के भीतर, उन्होंने अब्दुल से हिंदुस्तानी (उर्दू) सीखना शुरू कर दिया। उन्होंने अब्दुल को "मुंशी" (शिक्षक) की उपाधि दी।
सीमाओं के पार एक बंधन
जैसे-जैसे साल बीतते गए, अब्दुल का प्रभाव बढ़ता गया, जिससे शाही दरबार के लोग काफी परेशान थे। वह केवल एक नौकर नहीं थे; वह महारानी के सबसे करीबी विश्वासपात्र बन गए थे।
* शिक्षक: उन्होंने महारानी को उर्दू लिखना सिखाया और भारतीय राजनीति और दर्शन पर चर्चा की।
* साथी: उन्होंने महारानी के साथ यूरोप की यात्रा की, बेहतरीन शाही आवासों में रहे, और उन्हें विंडसर कैसल के मैदान में एक निजी कॉटेज दिया गया।
* सांस्कृतिक राजदूत: अब्दुल के माध्यम से ही महारानी को "असली" करी (सालन) का शौक हुआ, जो शाही मेज का मुख्य हिस्सा बन गया।
महारानी उन्हें लिखे अपने पत्रों के अंत में मातृत्व और गहरे स्नेह के साथ "तुम्हारी प्यारी माँ" और "तुम्हारी सबसे करीबी दोस्त" जैसे शब्द लिखती थीं। हालांकि इतिहासकार इस बात पर बहस करते हैं कि क्या यह रिश्ता रूमानी था, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि यह "दिल का मामला" था—एक ऐसी भावनात्मक निकटता जिसने महारानी के एकाकी जीवन के खालीपन को भर दिया था।
दरबार का विद्रोह
महारानी के परिवार और उनके कर्मचारियों द्वारा "मुंशी" से नफरत की जाती थी। इसके पीछे उस समय के कठोर सामाजिक ढांचे के कई कारण थे:
* वर्ग और नस्ल: दरबारियों को यह बर्दाश्त नहीं था कि एक "आम" भारतीय व्यक्ति के साथ एक अंग्रेज कुलीन के समान व्यवहार किया जाए।
* ईर्ष्या: उन्हें डर था कि अब्दुल का राजनीतिक प्रभाव बढ़ रहा है, खासकर जब वह भारत में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच तनाव के बारे में महारानी से बात करते थे।
* जॉन ब्राउन की याद: कर्मचारी पहले ही महारानी की अपने स्कॉटिश सेवक जॉन ब्राउन के साथ नजदीकी देख चुके थे, और वे इसे दोबारा होते नहीं देखना चाहते थे।
शाही कर्मचारियों ने सामूहिक रूप से इस्तीफा देने की धमकी तक दे दी और अब्दुल पर जासूस होने का आरोप लगाया। लेकिन विक्टोरिया ने डटकर उनका मुकाबला किया। उन्होंने अपने कर्मचारियों पर "नस्लीय पूर्वाग्रह" का आरोप लगाया और अपने मुंशी की रक्षा की। यहाँ तक कि उन्होंने अब्दुल को 'कमांडर ऑफ द विक्टोरियन ऑर्डर' (CVO) से सम्मानित भी किया।
एक कड़वा अंत
यह मित्रता 1901 में विक्टोरिया की मृत्यु तक 14 वर्षों तक चली।
महारानी के निधन के तुरंत बाद, शाही परिवार ने अपना बदला लिया। उनके बेटे, किंग एडवर्ड VII के नेतृत्व में, अब्दुल के कॉटेज पर छापा मारा गया। महारानी द्वारा उन्हें लिखे गए हर पत्र को इकट्ठा किया गया और बगीचे में जला दिया गया, जबकि अब्दुल को यह सब देखने के लिए मजबूर किया गया।
अब्दुल को बेदखल कर भारत वापस भेज दिया गया। उन्होंने अपने जीवन के शेष दिन आगरा में बिताए और 1909 में उनका निधन हो गया। उनकी कहानी को काफी हद तक भुला दिया गया था, जब तक कि 2010 में उनकी निजी डायरियों की दोबारा खोज नहीं हुई, जिसने उनके इस असाधारण संबंध की गहराई को दुनिया के सामने ला दिया।