कोणार्क का सूर्य मंदिर

कोणार्क का सूर्य मंदिर

कोणार्क का सूर्य मंदिर केवल पत्थरों का एक ढांचा नहीं है; यह स्थापत्य कला की भाषा में लिखी गई एक महाकाव्य कविता है। ओडिशा के समुद्र तट पर स्थित यह मंदिर कलिंग वास्तुकला के चरमोत्कर्ष का प्रतिनिधित्व करता है।
यहाँ इस मंदिर के बनने के पीछे की कहानी और इसके निर्माण की प्रक्रिया का विस्तृत विवरण दिया गया है:


1. क्यों बनाया गया: रथ के पीछे का उद्देश्य
इस मंदिर का निर्माण 13वीं शताब्दी (लगभग 1250 ईस्वी) में पूर्वी गंगा राजवंश के राजा लांगुला नरसिंहदेव प्रथम द्वारा करवाया गया था। इसके पीछे तीन मुख्य कारण थे:
विजय का स्मारक
राजा नरसिंहदेव प्रथम एक पराक्रमी योद्धा थे। उन्होंने बंगाल के मुस्लिम शासकों को युद्ध में परास्त किया था।
 * शक्ति का प्रतीक: इतिहासकारों का मानना है कि यह मंदिर एक "विजय स्तंभ" के रूप में बनाया गया था। इतने विशाल मंदिर का निर्माण कर राजा अपनी साम्राज्यिक शक्ति और स्थिरता का प्रदर्शन करना चाहते थे।
 * दैवीय अधिकार: सूर्य को ब्रह्मांड की शक्ति का स्रोत माना जाता है। सूर्य देव को यह भव्य मंदिर समर्पित करके राजा स्वयं को ईश्वरीय सत्ता से जोड़ना चाहते थे।
आध्यात्मिक विरासत: साम्ब की कथा
कोणार्क (Arka Kshetra) प्राचीन काल से ही सूर्य उपासना का केंद्र था।
 * साम्ब की मुक्ति: पुराणों के अनुसार, भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब को कुष्ठ रोग का श्राप मिला था। उन्होंने चंद्रभागा नदी के तट पर 12 वर्षों तक सूर्य देव की कठिन तपस्या की। सूर्य देव ने प्रसन्न होकर उन्हें रोगमुक्त कर दिया।
 * पवित्र भूमि: माना जाता है कि साम्ब ने ही यहाँ पहला सूर्य मंदिर बनाया था। राजा नरसिंहदेव ने इसी पवित्र भूमि को चुना ताकि वे उस प्राचीन परंपरा को एक भव्य रूप दे सकें।
2. कैसे बनाया गया: नामुमकिन इंजीनियरिंग
कोणार्क का निर्माण मध्यकालीन इंजीनियरिंग का एक चमत्कार है। इसे बनाने में 1,200 शिल्पकारों को लगभग 12 साल का समय लगा।
रथ का स्वरूप
यह मंदिर किसी साधारण इमारत की तरह नहीं, बल्कि एक विशाल पत्थर के रथ के रूप में बनाया गया है।
 * 24 पहिये: मंदिर के चबूतरे पर 24 विशाल पत्थर के पहिये उकेरे गए हैं। ये केवल सजावट नहीं हैं, बल्कि धूपघड़ी (Sundials) हैं। आज भी इन पहियों की छाया देखकर समय का सटीक अनुमान (मिनटों तक) लगाया जा सकता है।
 * 7 घोड़े: रथ को सात दौड़ते हुए घोड़े खींच रहे हैं, जो सप्ताह के सात दिनों और इंद्रधनुष के सात रंगों के प्रतीक हैं।
सामग्री और रसद
मंदिर के निर्माण में तीन प्रकार के पत्थरों का उपयोग किया गया: क्लोराइट (दरवाजों और मूर्तियों के लिए), लैटेराइट (नींव के लिए), और खोंडालाइट (मुख्य ढांचे के लिए)।
 * परिवहन: ये पत्थर स्थानीय स्तर पर उपलब्ध नहीं थे। इन्हें नदी के रास्ते बड़े-बड़े बेड़ों (rafts) पर लादकर हाथियों की मदद से निर्माण स्थल तक लाया गया था।
 * लोहे के बीम और चुंबक: पत्थरों को जोड़ने के लिए सीमेंट नहीं, बल्कि लोहे के खांचों और कुण्डियों का उपयोग किया गया था। लोककथाओं के अनुसार, मंदिर के शीर्ष पर एक विशाल चुंबक लगा था जो पूरे ढांचे के संतुलन को बनाए रखता था।
3. धर्मपद की कहानी: पत्थर में बलिदान
कोणार्क का इतिहास धर्मपद के जिक्र के बिना अधूरा है। धर्मपद मुख्य शिल्पकार विशु महाराणा का 12 वर्षीय पुत्र था।
कहानी के अनुसार, जब 1,200 शिल्पकार मंदिर का शिखर (कलश) ठीक करने में असफल रहे, तो राजा ने क्रोधित होकर आदेश दिया कि यदि अगली सुबह तक काम पूरा नहीं हुआ, तो सभी 1,200 कारीगरों के सिर काट दिए जाएंगे। नन्हा धर्मपद वहां पहुँचा और उसने अपनी सूझबूझ से वह तकनीकी कमी दूर कर दी और कलश स्थापित कर दिया।
लेकिन शिल्पकारों को डर था कि यदि राजा को पता चला कि एक बच्चे ने वह काम कर दिखाया जो अनुभवी कारीगर नहीं कर सके, तो भी उनकी जान को खतरा होगा। अपने पिता और 1,200 कारीगरों की जान बचाने के लिए, धर्मपद ने मंदिर के शिखर से समुद्र में कूदकर अपनी जान दे दी।
4. पतन का कारण: आज यह खंडहर क्यों है?
आज मुख्य मंदिर का गर्भगृह नष्ट हो चुका है, केवल मुखशाला (Assembly Hall) बची है। इसके गिरने के कई कारण माने जाते हैं:
 * चुंबक की कहानी: कहा जाता है कि समुद्र से गुजरने वाले पुर्तगाली जहाजों के दिशा-सूचक यंत्र (Compasses) मंदिर के भारी चुंबक के कारण खराब हो जाते थे, जिससे जहाज भटक जाते थे। नाविकों ने उस चुंबक को हटा दिया, जिससे मंदिर का संतुलन बिगड़ गया।
 * आक्रमण: 15वीं और 17वीं शताब्दी में कालापहाड़ जैसे आक्रमणकारियों ने मंदिर को क्षतिग्रस्त किया।
 * प्राकृतिक कारण: समुद्री हवाओं के नमक और चक्रवातों ने समय के साथ पत्थरों को कमजोर कर दिया।
मुख्य तथ्य तालिका
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| निर्माता | राजा नरसिंहदेव प्रथम |
| समय | 13वीं शताब्दी (1250 ईस्वी) |
| शैली | कलिंग स्थापत्य शैली |
| प्रतीक | भगवान सूर्य का रथ |
| पहियों की संख्या | 24 (समय और महीनों के प्रतीक) |
कोणार्क का सूर्य मंदिर आज भी उस काल के भारतीय विज्ञान और कला का साक्षी है।

चलिए, कोणार्क के उन दो रहस्यों को गहराई से समझते हैं जो दुनिया भर के पर्यटकों और वैज्ञानिकों को हैरान करते हैं।
1. कोणार्क के पहियों से समय की गणना (Sundial Science)
मंदिर के आधार पर बने 24 पहिये केवल कलाकृति नहीं हैं, बल्कि वे बेहद सटीक धूपघड़ी हैं। इनमें से प्रत्येक पहिया लगभग 9.8 फीट व्यास का है और इसमें 8 मुख्य तीलियाँ (Spokes) और 8 पतली तीलियाँ हैं।
समय देखने की विधि:
 * मुख्य तीलियाँ: 8 मुख्य तीलियाँ 24 घंटों को विभाजित करती हैं। दो मुख्य तीलियों के बीच का समय 3 घंटे (1 पहर) होता है।
 * पतली तीलियाँ: मुख्य तीली और उसके बगल वाली पतली तीली के बीच का समय 1.5 घंटा (90 मिनट) होता है।
 * सटीकता: पहिये के किनारे पर मोतियों जैसी छोटी नक्काशी की गई है। एक पतली तीली और मुख्य तीली के बीच के 90 मिनट के अंतराल को 30 मोतियों (बिंदुओं) में बांटा गया है, यानी एक बिंदु 3 मिनट को दर्शाता है।
गणना कैसे करें?
जब आप पहिये के बीच के हिस्से (धुरी) पर अपनी उंगली या कोई पतली लकड़ी रखते हैं, तो उसकी छाया जिस बिंदु पर गिरती है, उससे आप सटीक समय जान सकते हैं। आज भी, यह धूपघड़ी मिनटों की सटीकता के साथ समय बताती है।
2. दीवारों पर उकेरी गई मूर्तियाँ और सामाजिक जीवन
कोणार्क की दीवारों को "पत्थर पर इतिहास" कहा जा सकता है। यहाँ की नक्काशी को तीन मुख्य श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
क. कामुक और कामुक कला (Erotic Sculptures)
खजुराहो की तरह कोणार्क भी अपनी कामुक मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है। इसके पीछे कई दार्शनिक कारण माने जाते हैं:
 * तांत्रिक प्रभाव: उस समय ओडिशा में तांत्रिक मत का प्रभाव था, जहाँ काम (Sex) को मोक्ष के मार्ग का एक हिस्सा माना जाता था।
 * अध्यात्म की परीक्षा: माना जाता था कि भक्त को मंदिर के भीतर (ईश्वर के पास) जाने से पहले अपनी सांसारिक इच्छाओं और वासनाओं को बाहर ही छोड़ देना चाहिए। ये मूर्तियाँ केवल बाहरी दीवारों पर हैं, गर्भगृह के भीतर नहीं।
 * प्रजनन का प्रतीक: सूर्य जीवन का स्रोत है, और ये मूर्तियाँ सृजन और जीवन की निरंतरता का उत्सव मनाती हैं।
ख. शाही और दैनिक जीवन
दीवारों पर राजा नरसिंहदेव प्रथम के जीवन के दृश्य उकेरे गए हैं:
 * राजा को अपने दरबार में बैठे हुए, सेना का नेतृत्व करते हुए, और यहाँ तक कि अपने गुरुओं से आशीर्वाद लेते हुए दिखाया गया है।
 * हजारों हाथियों, घोड़ों और सैनिकों के चित्र उस समय की सैन्य शक्ति को दर्शाते हैं।
 * महिलाओं को खाना पकाते, बाल संवारते और संगीत वाद्ययंत्र बजाते हुए दिखाया गया है, जो 13वीं सदी के उड़ीसा के सामाजिक जीवन की झलक देता है।
ग. विदेशी व्यापार के प्रमाण
एक बहुत ही रोचक नक्काशी में एक जिराफ को दिखाया गया है। चूंकि जिराफ भारत का जानवर नहीं है, यह इस बात का सबूत है कि उस समय ओडिशा के व्यापारियों के संबंध अफ्रीका के साथ थे और राजा के पास विदेशी उपहार आते थे।
3. वास्तुशिल्प का एक और चमत्कार: लोहे के बीम
आपको जानकर हैरानी होगी कि इस मंदिर में उस समय कंक्रीट या सीमेंट का उपयोग नहीं हुआ था। विशाल पत्थरों को आपस में जोड़ने के लिए तांबे की प्लेटों और लोहे के बड़े बीमों (Iron Beams) का उपयोग किया गया था। कुछ बीम 35 फीट से भी लंबे हैं। आज भी वैज्ञानिक इस बात पर शोध करते हैं कि 700 साल पहले बिना किसी आधुनिक वेल्डिंग तकनीक के इतना शुद्ध लोहा कैसे बनाया गया जिसमें आज तक जंग नहीं लगी।

तो आइए ब्रिटिश हस्तक्षेप और इसके निर्माण के पीछे की पवित्र ज्यामिति (Sacred Geometry) को समझते हैं।
1. मंदिर के अंदर रेत क्यों भरी गई है?
यदि आप आज कोणार्क जाते हैं, तो आप जगमोहन (मुख्य सभा भवन) के भीतर प्रवेश नहीं कर पाएंगे। इसका कारण यह है कि यह पूरी तरह से रेत से भरा हुआ है और इसे चारों ओर से सील कर दिया गया है।
ब्रिटिश बचाव अभियान (1901–1903)
19वीं शताब्दी के अंत तक, मंदिर गिरने की कगार पर था। मुख्य शिखर पहले ही गिर चुका था और सभा भवन पर भी खतरा मंडरा रहा था।
 * ढहने से रोकना: 1901 में बंगाल के ब्रिटिश लेफ्टिनेंट-गवर्नर सर जॉन वुडबर्न ने महसूस किया कि सभा भवन की छत अंदर की ओर गिर सकती है क्योंकि भीतरी खंभे अब वजन सहने में सक्षम नहीं थे।
 * समाधान: इसे बचाने के लिए ब्रिटिश इंजीनियरों ने पूरे हॉल को रेत से भरने का फैसला किया। उन्होंने छत में छेद किए और तब तक रेत भरी जब तक कि ढांचा अंदर से पूरी तरह ठोस न हो गया।
 * परिणाम: इस रेत ने एक आंतरिक सहारे का काम किया, जिसने दीवारों और छत को थामे रखा। इसके बाद प्रवेश द्वार को स्थायी रूप से बंद कर दिया गया।
आज की स्थिति: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) अब इस रेत को निकालने की योजना पर काम कर रहा है, क्योंकि वैज्ञानिकों का मानना है कि रेत के दबाव से दीवारों को नुकसान पहुँच सकता है।
2. वास्तु शास्त्र: कोणार्क की पवित्र ज्यामिति
सूर्य मंदिर का निर्माण केवल कला के लिए नहीं, बल्कि वास्तु शास्त्र और शिल्प शास्त्र के सटीक नियमों के अनुसार किया गया था।
सूर्य के साथ संरेखण (Solar Alignment)
मंदिर के डिजाइन की सबसे अद्भुत विशेषता इसका सूर्य के साथ तालमेल है:
 * सुबह की पहली किरण: मंदिर को इस तरह से बनाया गया था कि उगते सूर्य की पहली किरण मुख्य प्रवेश द्वार से होकर सभा भवन को पार करती थी और सीधे गर्भगृह में स्थित सूर्य देव की मूर्ति के माथे पर लगे हीरे पर पड़ती थी।
 * विषुव (Equinox) की सटीकता: साल में दो दिन (वसंत और शरद विषुव) जब दिन और रात बराबर होते हैं, सूर्य ठीक मंदिर के मुख्य द्वार के केंद्र से उगता हुआ दिखाई देता है।
12 और 7 का गणित
डिजाइन में उपयोग की गई संख्याएं गणितीय रूप से महत्वपूर्ण हैं:
 * 12 जोड़ी पहिये: वर्ष के 12 महीनों और 12 राशियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
 * 7 घोड़े: सप्ताह के 7 दिनों और संस्कृत छंदों के 7 मीटर (गायत्री, आदि) के प्रतीक हैं।
3. लोहे के बीम: मध्यकालीन धातु विज्ञान
जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, कोणार्क में लोहे का उपयोग क्रांतिकारी था।
 * जंग प्रतिरोध: दिल्ली के लौह स्तंभ की तरह, कोणार्क के बीम भी समुद्र के किनारे नमकीन हवा के बावजूद 750 वर्षों से जंग मुक्त हैं।
 * चुंबकीय संतुलन: लोककथाओं के अनुसार, मंदिर के शीर्ष पर एक 52 टन का भारी चुंबक (Lodestone) लगा था। कहा जाता है कि इस चुंबक की शक्ति से सूर्य देव की मूर्ति हवा में "तैरती" रहती थी—यदि यह सच था, तो यह प्राचीन इंजीनियरिंग का शिखर था।
सारांश तालिका: संरक्षण और विज्ञान
| विशेषता | उद्देश्य / तथ्य |
|---|---|
| रेत भरना | 1903 में अंग्रेजों द्वारा छत को गिरने से बचाने के लिए किया गया। |
| सौर संरेखण | सूर्य की पहली किरण सीधे मूर्ति के चरणों या माथे पर पड़ती थी। |
| चुंबक की कथा | 52 टन का चुंबक मंदिर के संतुलन का मुख्य केंद्र माना जाता था। |
| शुद्ध लोहा | इस्तेमाल किया गया लोहा लगभग 99% शुद्ध है, जो इसे जंग से बचाता है। |
कोणार्क का सूर्य मंदिर हमारे आध्यात्मिक अतीत और वैज्ञानिक भविष्य के बीच एक सेतु है। यह दर्शाता है कि प्राचीन भारतीय न केवल महान कलाकार थे, बल्कि मास्टर गणितज्ञ और खगोलशास्त्री भी थे।

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