सूर्य देवी और प्रेमला देवी

सूर्य देवी और प्रेमला देवी

सूर्य देवी और प्रेमला देवी की कहानी भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास के सबसे मार्मिक और चर्चित अध्यायों में से एक है। यह एक ऐसी गाथा है जिसमें एक साम्राज्य का पतन, बंदी बनाए जाने की त्रासदी और प्रतिशोध का वह अंतिम प्रयास शामिल है, जिसने कथित तौर पर उमय्यद खिलाफत की दिशा बदल दी थी।

हालाँकि ऐतिहासिक विवरण—मुख्य रूप से चचनामा—उनके जीवन का ढांचा प्रदान करते हैं, लेकिन उनकी कहानी को अक्सर प्रतिरोध और सिंध की 8वीं शताब्दी की विजय की भारी कीमत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

अलोर का पतन

यह कहानी 712 ईस्वी में सिंध (वर्तमान पाकिस्तान) के समृद्ध साम्राज्य से शुरू होती है। सिंध के अंतिम ब्राह्मण राजा, राजा दाहिर, अपनी राजधानी अलोर से शासन करते थे। वे एक शक्तिशाली शासक थे, लेकिन उन्हें पश्चिम से उठ रहे एक तूफान का सामना करना पड़ा: उमय्यद खिलाफत।

आक्रमण का तात्कालिक कारण देबल के तट पर समुद्री लुटेरों द्वारा अरब जहाजों की लूटपाट थी। इराक के गवर्नर हज्जाज बिन यूसुफ ने मुआवजे की मांग की। जब दाहिर ने कहा कि लुटेरों पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है, तो हज्जाज ने अपने युवा और कुशल भतीजे व दामाद मोहम्मद बिन कासिम को सिंध फतह करने के लिए भेजा।

सूर्य देवी और प्रेमला देवी राजा दाहिर की बेटियां थीं, जिनका पालन-पोषण ऐश्वर्य के बीच हुआ था। जब कासिम की सेना ने देबल की रक्षा पंक्तियों को तोड़ दिया और साम्राज्य के केंद्र की ओर बढ़ी, तो उनकी दुनिया बिखर गई।

अरोर का युद्ध

राजा दाहिर ने अरोर के युद्ध में अरब सेना का सामना किया। एक विशाल हाथी सेना और बहादुर रक्षकों के बावजूद, युद्ध का पासा तब पलट गया जब एक जलते हुए तीर ने दाहिर के हाथी को घायल कर दिया, जिससे वह सिंधु नदी में जा गिरा। अराजकता के बीच राजा दाहिर वीरगति को प्राप्त हुए।

राजा की मृत्यु के साथ ही साम्राज्य ढह गया। रानी लाडी और उनकी दो बेटियों को ब्राह्मणवाद के किले के पतन के बाद बंदी बना लिया गया। उस युग की परंपरा के अनुसार, राजकुमारी को "युद्ध की संपत्ति" के रूप में देखा गया—लेकिन उनकी उच्च प्रतिष्ठा और सुंदरता के कारण, उन्हें दमिश्क में खलीफा वालिद प्रथम के लिए आरक्षित रखा गया।

दमिश्क की यात्रा

सिंध के मैदानी इलाकों से सीरिया के मरुस्थल तक की यात्रा में कई महीने लगे। दोनों राजकुमारियों को कड़ी सुरक्षा के बीच ले जाया गया। ऐतिहासिक वृत्तांत बताते हैं कि इस यात्रा के दौरान, अपने गहरे दुख के बावजूद, दोनों बहनों ने एक योजना बनाना शुरू कर दिया था। उन्होंने अपना पिता, अपना घर और अपनी आजादी खो दी थी; अब उनके पास केवल अपनी बुद्धि बची थी।

जब वे दमिश्क के भव्य दरबार में पहुँचीं, तो खलीफा के लिए वे केवल "हिंद की भूमि" पर अपनी जीत के प्रतीक थीं। लेकिन उन बहनों के लिए, खलीफा वह व्यक्ति था जो उनके वंश के विनाश के लिए जिम्मेदार था।

प्रतिशोध की चतुर योजना

चचनामा के अनुसार, उनकी कहानी का चरमोत्कर्ष खलीफा के हरम की दीवारों के भीतर हुआ।

जब खलीफा ने सूर्य देवी को अपने पास बुलाया, तो वह गहरे शोक में उनके सामने उपस्थित हुईं। खलीफा के पूछने पर, सूर्य देवी ने आंसू बहाते हुए एक सोची-समझी योजना के तहत झूठ बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि मोहम्मद बिन कासिम ने उन्हें खलीफा के पास भेजने से पहले कई दिनों तक अपने पास रखा था, जिससे उन्होंने खलीफा के सम्मान का अपमान किया और उन्हें "अपवित्र" भेंट भेजी।

कासिम की मृत्यु

खलीफा, जो अपने गुस्से और गर्व के लिए जाना जाता था, आगबबूला हो गया। उसे लगा कि उसके सेनापति ने उसके विश्वास के साथ विश्वासघात किया है। बिना किसी औपचारिक जांच के, उसने एक तत्काल और क्रूर आदेश जारी किया:

> "मोहम्मद बिन कासिम को कच्ची गाय की खाल में सिल दिया जाए और एक संदूक में बंद करके वापस सीरिया लाया जाए।"

आदेश का पालन किया गया। वह युवा विजेता, जिसने साम्राज्य की सीमाएं भारत तक फैला दी थीं, उस खाल के भीतर दम घुटने के कारण रास्ते में ही मर गया।

अंतिम खुलासा

जब मोहम्मद बिन कासिम के अवशेषों वाला संदूक दमिश्क पहुंचा, तो खलीफा ने राजकुमारियों को यह दिखाने के लिए बुलाया कि उसके साथ विश्वासघात करने की क्या कीमत होती है। इसी क्षण बहनों ने अपने असली इरादे जाहिर किए।

कहा जाता है कि सूर्य देवी ने मृत सेनापति की ओर देखा और फिर खलीफा से कहा कि कासिम ने उन्हें कभी हाथ भी नहीं लगाया था। उसने उनके साथ वैसा ही सम्मानजनक व्यवहार किया था जैसा कि शाही कैदियों के साथ किया जाना चाहिए। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने यह झूठ केवल अपने पिता की मृत्यु और अपने देश की बर्बादी का बदला लेने के लिए बोला था। वे जानती थीं कि केवल खलीफा ही उस व्यक्ति को मार सकता है जिसने सिंध को जीता था।

राजकुमारियों का अंत

धोखे से अपने सबसे सफल सेनापति की हत्या कर देने का अहसास होने पर खलीफा का क्रोध चरम पर पहुँच गया। उनकी मृत्यु के बारे में अलग-अलग विवरण मिलते हैं, लेकिन सभी अत्यंत दुखद हैं। कुछ स्रोतों के अनुसार, खलीफा ने आदेश दिया कि दोनों बहनों को घोड़ों की पूंछ से बांधकर दमिश्क की गलियों में तब तक घसीटा जाए जब तक कि उनकी मृत्यु न हो जाए।

चाहे अंत जैसा भी रहा हो, सूर्य देवी और प्रेमला देवी ने अपनी मातृभूमि से हजारों मील दूर एक विदेशी भूमि में दम तोड़ा, लेकिन वे उस सेना के नेतृत्व को नष्ट करने के अपने आत्मघाती मिशन में सफल रहीं जिसने उनके घर को नष्ट किया था।

 

खलीफा वालिद प्रथम का सूर्य देवी की बातों पर इतनी जल्दी विश्वास कर लेना केवल एक "क्रोधपूर्ण निर्णय" नहीं था, बल्कि इसके पीछे उस समय की गहरी राजनीतिक साजिशें और आपसी दुश्मनी जिम्मेदार थी।

यहाँ उन प्रमुख कारणों का विश्लेषण दिया गया है जिन्होंने इस दुखद अंत की भूमिका तैयार की:

1. हज्जाज बिन यूसुफ और राजनीतिक गुटबाजी

मोहम्मद बिन कासिम का सबसे बड़ा सहारा उसका चाचा और ससुर, हज्जाज बिन यूसुफ था। हज्जाज इराक का गवर्नर था और उमय्यद साम्राज्य का सबसे शक्तिशाली (और क्रूर) व्यक्ति माना जाता था।

 * दुश्मनी: हज्जाज ने साम्राज्य के भीतर कई दुश्मन बना लिए थे, जिनमें भावी खलीफा सुलेमान बिन अब्दुल मलिक भी शामिल था।

 * वंशवाद का डर: खलीफा के दरबार में एक गुट ऐसा था जो हज्जाज और उसके वफादारों (जैसे कासिम) की बढ़ती ताकत से डरता था। उन्हें डर था कि कासिम की जीतें हज्जाज को इतना शक्तिशाली बना देंगी कि वह खलीफा को भी चुनौती दे सकता है।

2. खलीफा का अहंकार और 'सम्मान' की राजनीति

मध्यकालीन राजशाही में, एक राजा का सबसे बड़ा धन उसका "इकबाल" (प्रतिष्ठा) होता था।

 * सूर्य देवी ने बहुत ही चतुराई से कासिम पर नहीं, बल्कि सीधे खलीफा के सम्मान पर प्रहार किया। उन्होंने यह दावा किया कि कासिम ने खलीफा को "झूठी और इस्तेमाल की हुई" भेंट भेजी है।

 * उस दौर के कबीलाई और शाही कानूनों में, सुल्तान को भेजी गई किसी वस्तु या व्यक्ति के साथ छेड़छाड़ करना सीधे तौर पर 'राजद्रोह' (Treason) माना जाता था। खलीफा को लगा कि कासिम ने उसे नीचा दिखाने की कोशिश की है।

3. सत्ता का परिवर्तन (खलीफा वालिद और सुलेमान)

इतिहासकारों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि कासिम का पतन खलीफा वालिद की मृत्यु और उसके भाई सुलेमान के गद्दी पर बैठने के साथ जुड़ा है।

 * सुलेमान, हज्जाज बिन यूसुफ से नफरत करता था। चूँकि हज्जाज मर चुका था, सुलेमान ने अपना गुस्सा हज्जाज के परिवार और उसके सबसे सफल सेनापति, मोहम्मद बिन कासिम पर निकाला।

 * सूर्य देवी और प्रेमला देवी की गवाही ने सुलेमान (या वालिद के अंतिम दिनों के दरबारियों) को वह नैतिक और कानूनी बहाना दे दिया, जिसकी उन्हें कासिम को रास्ते से हटाने के लिए तलाश थी।

4. दूरी और संचार की कमी

दमिश्क और सिंध के बीच हजारों मील की दूरी थी। उस समय संदेश पहुँचने में महीनों लग जाते थे।

 * खलीफा के पास कासिम से स्पष्टीकरण मांगने या निष्पक्ष जांच करने का धैर्य नहीं था।

 * जब राजकुमारियों ने आरोप लगाया, तो दरबार में मौजूद कासिम के विरोधियों ने आग में घी डालने का काम किया ताकि जांच से पहले ही उसे सजा सुना दी जाए।

निष्कर्ष: राजकुमारियों की बुद्धिमत्ता

सूर्य देवी और प्रेमला देवी ने यह भांप लिया था कि उमय्यद दरबार में आंतरिक कलह चल रही है। उन्होंने केवल एक झूठ नहीं बोला, बल्कि एक "राजनीतिक जाल" बुना। वे जानती थीं कि:

 * खलीफा अपनी प्रतिष्ठा के प्रति असुरक्षित है।

 * कासिम की सफलता से जलने वाले लोग दरबार में भरे पड़े हैं।

इसीलिए, उन्होंने अपनी पवित्रता की बलि देकर अपने दुश्मन के सबसे बड़े हथियार (कासिम) को उसी के राजा के हाथों खत्म करवा दिया। यह इतिहास में 'मनोवैज्ञानिक युद्ध' (Psychological Warfare) का एक अद्भुत उदाहरण माना जाता है।

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