'रुप्य' का जन्म (ईसा पूर्व छठी शताब्दी)

'रुप्य' का जन्म (ईसा पूर्व छठी शताब्दी)

'रुप्य' का जन्म (ईसा पूर्व छठी शताब्दी)
हमारी कहानी आज के बैंकों से नहीं, बल्कि प्राचीन भारत के महाजनपदों के धूल भरे बाज़ारों से शुरू होती है। कल्पना कीजिए एक व्यापारी की, जिसके पास बटुआ नहीं, बल्कि चमड़े की एक थैली है जिसमें चांदी के टेढ़े-मेढ़े टुकड़े भरे हैं।
इन्हें 'आहत सिक्के' (Punch-Marked Coins) कहा जाता था। व्यापारी चांदी के टुकड़े को पीटकर चपटा करता और उस पर सूर्य, पेड़ या सांड जैसे प्रतीक ठप्पा मारकर अंकित कर देता। यही शुद्ध व्यापार का युग था, जहाँ सिक्के की कीमत उसमें मौजूद धातु के वजन में होती थी।
मौर्य काल का अनुशासन
जब चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य ने विशाल साम्राज्य बनाया, तो उन्होंने समझा कि व्यापार के लिए एक मानक मुद्रा जरूरी है। चाणक्य ने 'अर्थशास्त्र' में मुद्रा के नियम लिखे। उन्होंने 'रुप्यरूप' (चांदी के सिक्के) और 'ताम्ररूप' (तांबे के सिक्के) पेश किए।
> शब्द की उत्पत्ति: "रुपया" शब्द संस्कृत के 'रुप्य' से आया है, जिसका अर्थ है 'गढ़ी हुई चांदी' या 'सुंदर आकार'।

भाग 2: स्वर्ण युग और रेशम मार्ग (सिल्क रोड)
गुप्त साम्राज्य (320–550 ईस्वी) के दौरान भारत ने अपना "स्वर्ण युग" देखा। इस समय के सिक्के, जिन्हें 'दीनार' कहा जाता था, कला का अद्भुत नमूना थे। इन पर राजाओं को वीणा बजाते या शेर का शिकार करते हुए दिखाया जाता था। भारतीय सोने के सिक्कों की साख रोम से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक थी—यह उस दौर का 'अमेरिकी डॉलर' था।
भाग 3: शेरशाह सूरी और मुगलों का सुधार
मध्यकाल में मुद्रा व्यवस्था थोड़ी बिखरी हुई थी, लेकिन 1540 में कहानी में एक बड़ा मोड़ आया जब शेरशाह सूरी गद्दी पर बैठा। उसने सिर्फ पांच साल राज किया, लेकिन आधुनिक रुपये की नींव रख दी।
उसने 178 ग्रेन (लगभग 11.5 ग्राम) वजन का चांदी का सिक्का चलाया और उसे नाम दिया— 'रुपिया'। बाद में मुगलों ने इसी व्यवस्था को अपनाया। अकबर ने इसे और सुधारा और तीन धातुओं की प्रणाली शुरू की:
 * मुहर: सोने का सिक्का (बड़ी बचत के लिए)।
 * रुपया: चांदी का सिक्का (व्यापार की मुख्य कड़ी)।
 * दाम: तांबे का सिक्का (आम जनता की रोजमर्रा की खरीदारी के लिए)।
भाग 4: 'कंपनी' का आगमन और ब्रिटिश राज
1600 के दशक में ईस्ट इंडिया कंपनी भारत आई। शुरुआत में वे मुगल सिक्कों का ही इस्तेमाल करते थे, लेकिन मुगलों के कमजोर होते ही अंग्रेजों ने अपनी टकसालें खोल लीं। 1835 में अंग्रेजों ने 'मुद्रा अधिनियम' (Coinage Act) पारित किया ताकि पूरे भारत में एक ही तरह का रुपया चले। अब सिक्कों पर मुगल बादशाह की जगह ब्रिटिश राजा विलियम चतुर्थ की तस्वीर छपने लगी।
भाग 5: कागज की क्रांति (1861)
कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्ट 1861 में आया, जब 'पेपर करेंसी एक्ट' पारित हुआ। अब तक पैसा भारी होता था—अगर आपको घर खरीदना है, तो चांदी के सिक्कों से लदी गाड़ी ले जानी पड़ती थी।
सरकार ने 'प्रॉमिसरी नोट' (वचन पत्र) जारी किए। लोग डरे हुए थे कि कागज का टुकड़ा चांदी की जगह कैसे ले सकता है? लोगों का भरोसा जीतने के लिए शुरू में 'विक्टोरिया पोर्ट्रेट' नोट जारी किए गए। ये नोट एक तरफ से छपे होते थे और सुरक्षा के लिए इन्हें बीच से काटकर दो अलग-अलग लिफाफों में भेजा जाता था। दोनों हिस्से मिलने पर ही उन्हें जोड़कर इस्तेमाल किया जा सकता था।
भाग 6: आजादी और गांधी सीरीज
1947 में आजादी के बाद भारत ने अपनी मुद्रा से ब्रिटिश राज के प्रतीकों को हटा दिया। किंग जॉर्ज की जगह सारनाथ के अशोक स्तंभ ने ले ली। 1957 में भारत ने 'दशमलव प्रणाली' अपनाई, जहाँ 1 रुपया = 100 पैसे हो गया। इससे पहले 1 रुपया 16 आने या 64 पैसे का होता था।
1996 में भारतीय रिजर्व बैंक ने 'महात्मा गांधी सीरीज' के नोट जारी किए। यह एक काव्यात्मक न्याय था—जिस साम्राज्य के खिलाफ गांधीजी लड़े थे, आज उसी की बनाई मुद्रा प्रणाली पर उनकी तस्वीर शान से चमक रही थी।
भाग 7: आधुनिक युग: डिजिटल क्रांति
कहानी कागज पर खत्म नहीं होती। 2016 की नोटबंदी ने भारत को डिजिटल भुगतान की ओर धकेल दिया। आज हम UPI के युग में हैं, जहाँ फोन के एक स्कैन से भुगतान हो जाता है। और अब, आरबीआई अपनी डिजिटल मुद्रा 'e-रुपया' (CBDC) ला रहा है।
चांदी के उन आहत सिक्कों से लेकर आज के डिजिटल कोड तक, भारतीय रुपये का सफर भारत के विकास और संघर्ष की कहानी कहता है।

मुगलकालीन टकसालों का वैभव और वह दौर जब चांदी ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया था।


1. मुगलों की टकसालें: शाही वैभव और शुद्धता का जुनून
मुगल काल (खासकर अकबर से औरंगजेब तक) भारतीय रुपये का "स्वर्ण काल" माना जाता है। उस समय का रुपया दुनिया की सबसे शुद्ध और प्रतिष्ठित मुद्राओं में से एक था।
टकसालों का जाल (The Network of Mints)
मुगल साम्राज्य में लगभग 200 से अधिक टकसालें (Mints) थीं। लेकिन इनकी खासियत यह थी कि ये आज के कारखानों जैसी नहीं थीं। ये कला के केंद्र थे। सिक्का ढालने की प्रक्रिया कुछ ऐसी थी:
 * शुद्धता का परीक्षण: धातु को पिघलाकर पूरी तरह शुद्ध किया जाता था। मुगल रुपये की शुद्धता लगभग 96% से 98% तक होती थी, जो उस समय की वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक मानक था।
 * नक्काशी (Calligraphy): क्योंकि इस्लाम में जीवित प्राणियों के चित्र बनाना वर्जित माना जाता था, इसलिए मुगलों ने सिक्कों पर 'अरबी' और 'फारसी' लिपि की सुंदर नक्काशी की। इन पर बादशाह का नाम, शासन का वर्ष और उस शहर का नाम लिखा होता था जहाँ सिक्का ढाला गया।
 * जहाँगीर के अनोखे प्रयोग: अकबर के बेटे जहाँगीर ने परंपरा तोड़कर सिक्कों पर अपनी तस्वीर और 12 राशियों (Zodiac Signs) के चित्र अंकित करवाए थे। आज ये सिक्के दुनिया के सबसे महंगे और दुर्लभ सिक्कों में गिने जाते हैं।
2. चांदी का संकट (The Great Silver Crisis)
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में एक ऐसी घटना हुई जिसने भारतीय रुपये की कमर तोड़ दी थी। इसे इतिहास में "रुपये का पतन" (Fall of the Rupee) कहा जाता है।
क्या हुआ था?
उस समय दुनिया के अमीर देश (जैसे ब्रिटेन) 'Gold Standard' (स्वर्ण मानक) पर थे, यानी उनकी मुद्रा की कीमत सोने से तय होती थी। लेकिन भारत 'Silver Standard' (रजत मानक) पर था।
1870 के आसपास, अमेरिका और यूरोप में चांदी की विशाल खदानें मिलीं। बाजार में चांदी की बाढ़ आ गई और उसकी कीमत गिर गई। चूंकि भारतीय रुपया पूरी तरह चांदी पर टिका था, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपये की कीमत तेजी से गिर गई।
 * परिणाम: भारत को विदेशों से सामान खरीदना बहुत महंगा पड़ने लगा। इसी संकट के कारण अंग्रेजों को समझ आया कि केवल धातु के भरोसे करेंसी नहीं चल सकती, और यहीं से कागजी नोटों (Paper Currency) को गंभीरता से अपनाने की शुरुआत हुई।
3. 1947 का बंटवारा: जब सिक्कों पर 'पाकिस्तान' की मुहर लगी
यह एक ऐसा तथ्य है जो बहुत कम लोग जानते हैं। 15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ और पाकिस्तान बना। लेकिन पाकिस्तान के पास अपनी कोई बैंक या टकसाल नहीं थी।
 * अस्थायी समाधान: बंटवारे के बाद लगभग एक साल तक पाकिस्तान में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ही नोट चलते रहे।
 * मुहर का खेल: उन भारतीय नोटों पर नीली स्याही से "Government of Pakistan" की मुहर लगा दी जाती थी। 1948 में जब पाकिस्तान ने अपना केंद्रीय बैंक बनाया, तब जाकर उन्होंने अपनी अलग मुद्रा जारी की।
4. एक रुपये का नोट: जो 'सिक्का' भी है और 'नोट' भी
क्या आपने कभी गौर किया है? सभी बड़े नोटों (50, 100, 500) पर RBI गवर्नर के हस्ताक्षर होते हैं और उस पर लिखा होता है "मैं धारक को... वचन देता हूँ।"
लेकिन 1 रुपये के नोट पर भारत के वित्त सचिव (Finance Secretary) के हस्ताक्षर होते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐतिहासिक रूप से 1 रुपया भारत की 'आधार इकाई' (Base Unit) रहा है। कानूनन, 1 रुपये का नोट असल में एक 'सिक्का' माना जाता है जिसे कागज पर छापा गया है। इसीलिए इस पर "वचन देता हूँ" जैसी बात नहीं लिखी होती।
क्या आप जानते हैं?
1954 में भारत में 5,000 और 10,000 रुपये के नोट भी चलते थे! ये मुख्य रूप से बैंकों के बीच बड़े लेनदेन के लिए थे। लेकिन 1978 में मोरारजी देसाई की सरकार ने इन्हें बंद कर दिया ताकि भ्रष्टाचार और काले धन पर रोक लगाई जा सके।

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