तेरहवीं शताब्दी की हवाएं उत्तर भारत के मैदानों में बड़ी बेरहमी से चल रही थीं, जिनमें धूल, घोड़ों के पसीने और इंसानी वफादारियों के बदलने की महक घुली थी। पुरानी दिल्ली के केंद्र में, किला राय पिथौरा की लाल बलुआ पत्थर की दीवारों के भीतर एक क्रांति जन्म ले रही थी—यह किसी विदेशी हमलावर ने नहीं, बल्कि एक बेटी ने शुरू की थी।
यह कहानी है रज़िया सुल्तान की, जो दिल्ली सल्तनत की पहली महिला शासक थीं; एक ऐसी महिला जिसने घूंघट त्याग कर तलवार थामी और हरम की चारदीवारी छोड़कर सिंहासन को चुना।
सुल्तान का चुनाव
इस कहानी की शुरुआत सुल्तान इल्तुतमिश से होती है, एक ऐसा शख्स जो दास से हिंदुस्तान का मालिक बना था। उसके कई बेटे थे, लेकिन जैसे-जैसे वे बड़े हुए, इल्तुतमिश का दिल भारी होता गया। उसके बेटे शराब, शायरी और ऐशो-आराम में डूबे रहते थे। उनमें से किसी में भी वह 'फौलादी जिगर' नहीं था जो एक बिखरते साम्राज्य को संभाल सके।
लेकिन वहां रज़िया थी।
जब उसके भाई रेशमी बगीचों में सुस्ताते थे, रज़िया अपने पिता के साथ प्रशासनिक बैठकों में खड़ी होती थी। उसने देखा कि कैसे उसके पिता ने 'चालीसा' (तुर्क रईसों का वह शक्तिशाली दल जो सत्ता की असली चाबी रखता था) के बीच संतुलन बनाए रखा। इल्तुतमिश ने रज़िया में एक तेज, कूटनीतिक दिमाग और एक ऐसी रूह देखी जो फौलाद की चमक से घबराती नहीं थी।
1231 में, ग्वालियर के सैन्य अभियान पर जाते समय इल्तुतमिश ने वह किया जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी: उसने दिल्ली की जिम्मेदारी रज़िया को सौंप दी।
जब वह वापस लौटा, तो उसने शहर को फलते-फूलते और प्रशासन को सुचारू पाया। उसने अपने लेखकों को बुलाया और रज़िया को अपना उत्तराधिकारी घोषित करने का फरमान जारी करने का आदेश दिया। दरबारी हक्के-बक्के रह गए। "एक औरत मोमिनों का नेतृत्व करेगी?" वे फुसफुसाए। इल्तुतमिश ने उन्हें एक निगाह से खामोश कर दिया: "मेरे बेटे जवानी के मजे में डूबे हैं। उनमें से एक में भी शासन करने की काबिलियत नहीं है। रज़िया ऐसे बीस बेटों से बेहतर है।"
सिंहासन की छाया
लेकिन दुनिया अभी तैयार नहीं थी। 1236 में इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद, तुर्क रईसों ने तुरंत उसकी वसीयत को खारिज कर दिया। उन्होंने उसके बेटे रुकनुद्दीन फिरोज को ताज पहना दिया, जिसकी एकमात्र खूबी सरकारी खजाने को हाथियों और नर्तकियों पर लुटाना था।
साम्राज्य बिखरने लगा। रुकनुद्दीन की माँ, शाह तुर्कान ने सत्ता की कमान संभाली और आतंक का शासन शुरू कर दिया। उसने विरोधियों को मरवाना शुरू किया और दिल्ली को अराजकता में झोंक दिया।
रज़िया जानती थी कि उसके पास केवल एक मौका है। उसने एक जबरदस्त मनोवैज्ञानिक चाल चली। वह लाल रंग के कपड़े पहनकर—जो उस समय न्याय मांगने वालों का पारंपरिक रंग था—जुमे की नमाज के दौरान कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद में जनता के सामने पेश हुई।
उसने दरबारियों से नहीं, बल्कि आम जनता से बात की।
"मुझे मेरे लिंग से नहीं," वह पुकारी, "बल्कि मेरे पिता की विरासत से परखो। अगर मैं शांति लाने में विफल रहूं, तो आप मेरा सिर कलम कर सकते हैं।"
आम लोग, उसके साहस से प्रभावित होकर और व्यवस्था की चाह में, एक विशाल लहर की तरह उठ खड़े हुए। उन्होंने महल पर धावा बोल दिया, रुकनुद्दीन को गद्दी से उतार दिया और इस्लामी इतिहास में पहली बार, एक महिला को जनता की इच्छा से सिंहासन पर बैठाया गया।
एक सम्राट का शासन
रज़िया केवल एक "सुल्ताना" नहीं थी (यह शब्द आमतौर पर सुल्तान की पत्नी के लिए उपयोग किया जाता था)। उसने जिद की कि उसे सुल्तान रज़िया कहा जाए।
उसने महिलाओं के पारंपरिक पहनावे को त्याग दिया और पर्दा हटा दिया। वह जनता के सामने पुरुषों की तरह कुबा (चोगा) और कुलह (टोपी) पहनकर आने लगी। वह अपनी सेनाओं का नेतृत्व करती थी, हाथी की पीठ पर बैठकर युद्ध लड़ती थी, और खुला दरबार लगाती थी जहाँ कोई भी न्याय के लिए उसके पास आ सकता था।
वह प्रतिभाशाली थी, लेकिन भेड़ियों से घिरी हुई थी। 'चालीसा' के रईस उससे नफरत करते थे—सिर्फ इसलिए नहीं कि वह एक महिला थी, बल्कि इसलिए क्योंकि वह प्रभावी थी। उसने तुर्कों के एकाधिकार को तोड़ने के लिए गैर-तुर्कों को ऊंचे पदों पर नियुक्त करना शुरू कर दिया। उसका सबसे करीबी विश्वासपात्र जमाल-उद-दीन याकूत था, जो एक एबिसिनियन (अफ्रीकी) दास था और अस्तबल का प्रमुख बना था।
दरबारी रानी और उस अफ्रीकी गुलाम के बीच प्रेम संबंधों की अफवाहें फैलाने लगे, ताकि रूढ़िवादी जनता के मन में रज़िया के खिलाफ जहर घोला जा सके। चाहे वह प्यार था या गहरा भरोसा, याकूत ही वह शख्स था जिस पर रज़िया वास्तव में भरोसा कर सकती थी।
पतन और किला
विद्रोह की आग आखिरकार भटिंडा में भड़की। वहां के गवर्नर मालिक अल्तूनिया ने, जो रज़िया का बचपन का दोस्त था, बगावत कर दी।
रज़िया उसका मुकाबला करने के लिए निकली। लेकिन साजिश गहरी थी। युद्ध के दौरान, उसके वफादार याकूत की उसकी आँखों के सामने हत्या कर दी गई और रज़िया को कैद कर 'किला मुबारक' की अंधेरी कोठरियों में डाल दिया गया।
दिल्ली में रईसों ने आनन-फानन में उसके सौतेले भाई बहराम शाह को राजा बना दिया। लेकिन अल्तूनिया को जल्द ही अहसास हुआ कि दिल्ली के रईसों ने उसका इस्तेमाल किया है और उसे लूट का सही हिस्सा नहीं दिया।
किस्मत ने करवट ली और कैदी और कैद करने वाले के बीच एक समझौता हुआ। रज़िया ने अल्तूनिया से शादी कर ली। दोनों ने मिलकर अपना सिंहासन वापस पाने के लिए एक नई सेना तैयार की।
अंतिम सूर्यास्त
दिल्ली की ओर कूच करना एक हताश जुआ था। अक्टूबर 1240 में रज़िया और अल्तूनिया की सेनाओं का सामना सुल्तान की सेना से हुआ। वे संख्या में कम थे और थके हुए थे। युद्ध एक खूनी संघर्ष साबित हुआ और रज़िया की सेना हार गई।
अपनी जान बचाकर भागते हुए रज़िया और अल्तूनिया कैथल के पास के जंगलों में पहुँचे। वहां, कहानियों के अनुसार, उन्हें धोखा दिया गया। जब वे एक पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे, तो डाकुओं के एक समूह (या शायद बहराम शाह द्वारा भेजे गए हत्यारों) ने उन पर हमला कर दिया और उन्हें मार डाला।
जिस महिला ने एक साम्राज्य को चुनौती दी थी, उसकी मृत्यु एक सुनसान जंगल की धूल में हुई।
विरासत
रज़िया सुल्तान ने केवल तीन साल, छह महीने और छह दिन शासन किया। लेकिन समय के उस छोटे से टुकड़े में उसने साबित कर दिया कि अधिकार जन्म या लिंग का विषय नहीं, बल्कि चरित्र का विषय है।
आज, उसकी कब्र पुरानी दिल्ली की एक शांत और तंग गली में स्थित है—जो वक्त के साथ अपनी चमक खो चुकी है। फिर भी, उसकी कहानी उस महिला की भावना के प्रतीक के रूप में जीवित है, जिसने उस समय पर्दे के पीछे रहने से इनकार कर दिया जब दुनिया को एक नेता की जरूरत थी।
रज़िया सुल्तान का शासनकाल केवल वीरता की कहानी नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक शतरंज और सत्ता के संघर्ष की एक मिसाल है। आइए, रज़िया के जीवन के उन दो सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं को गहराई से समझते हैं जिन्होंने उन्हें इतिहास में अमर कर दिया:
1. 'चालीसा' (तुर्क-ए-चहलगानी) के साथ रज़िया का संघर्ष
इल्तुतमिश ने 'चालीसा' नामक 40 तुर्क गुलाम सरदारों का एक दल बनाया था। ये लोग सुल्तान के सबसे वफादार माने जाते थे, लेकिन इल्तुतमिश की मौत के बाद वे खुद को 'किंगमेकर' समझने लगे थे।
रज़िया की रणनीति: "फूट डालो और शासन करो"
रज़िया जानती थी कि जब तक ये 40 तुर्क सरदार एक हैं, उसकी सत्ता सुरक्षित नहीं है। उन्होंने बहुत ही चालाकी से काम लिया:
* गैर-तुर्कों को बढ़ावा: रज़िया ने प्रशासन में संतुलन बनाने के लिए ताजिकों और स्थानीय भारतीय मुसलमानों को ऊंचे पद देने शुरू किए।
* याकूत की नियुक्ति: जमाल-उद-दीन याकूत को 'अमीर-ए-अखूर' (शाही अस्तबल का प्रमुख) बनाना तुर्क सरदारों के मुंह पर एक तमाचा था। यह पद परंपरागत रूप से केवल तुर्कों के लिए था।
* सरदारों में फूट: जब तुर्क सरदारों ने विद्रोह किया, तो रज़िया ने सीधे युद्ध करने के बजाय कूटनीति का सहारा लिया। उन्होंने विद्रोही खेमे के कुछ सरदारों को गुप्त संदेश भेजकर अपनी ओर मिला लिया, जिससे उनके बीच आपसी अविश्वास पैदा हो गया और विद्रोह बिना खून बहाए बिखर गया।
2. सैन्य नेतृत्व और युद्ध कौशल
रज़िया सिर्फ एक शासिका नहीं, बल्कि एक कुशल सेनापति भी थीं। 13वीं सदी में एक महिला का युद्ध के मैदान में उतरना अकल्पनीय था।
युद्ध के मैदान में बदलाव
* शाही लिबास: रज़िया ने औरतों के कपड़े छोड़ दिए क्योंकि वे घुड़सवारी और तलवारबाजी में बाधा थे। उन्होंने सैनिकों जैसा चोगा और टोपी अपनाई ताकि युद्ध के मैदान में वह अपने सैनिकों के साथ घुल-मिल सकें और उनका नेतृत्व कर सकें।
* हाथी का चुनाव: रज़िया अक्सर युद्ध के दौरान हाथी पर सवार होती थीं। यह न केवल उनकी बहादुरी का प्रतीक था, बल्कि वहां से वह पूरे युद्ध क्षेत्र पर नजर रख सकती थीं और अपनी सेना को स्पष्ट निर्देश दे सकती थीं।
* रणथंभौर का अभियान: अपने शासन के शुरुआती दौर में ही उन्होंने रणथंभौर के विद्रोह को कुचलने के लिए सेना भेजी और सफलतापूर्वक नियंत्रण स्थापित किया, जिससे यह संदेश गया कि दिल्ली का सिंहासन अब किसी कमजोर हाथ में नहीं है।
3. रज़िया और याकूत: प्रेम या कूटनीति?
इतिहासकारों के बीच जमाल-उद-दीन याकूत और रज़िया के संबंधों को लेकर हमेशा बहस रही है।
* दरबारी प्रोपेगेंडा: मिन्हाज-उस-सिराज जैसे समकालीन इतिहासकारों ने संकेत दिया है कि उनके बीच गहरी निकटता थी। हालांकि, कई आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि यह 'चालीसा' द्वारा रज़िया के चरित्र पर कीचड़ उछालने की एक चाल थी।
* राजनीतिक जरूरत: याकूत रज़िया का सबसे वफादार साथी था क्योंकि वह 'चालीसा' का हिस्सा नहीं था। उसकी वफादारी केवल रज़िया के प्रति थी, जो एक घिरी हुई रानी के लिए बहुत कीमती थी।
आइए विस्तार से समझते हैं कि कैसे उन्होंने उस समय के हर सामाजिक नियम को तोड़ते हुए एक मध्यकालीन साम्राज्य को एकजुट रखा।
1. रज़िया का सैन्य कौशल
रज़िया केवल नाम की शासिका नहीं थीं; वह एक ऐसी रणनीतिकार थीं जो जानती थीं कि 13वीं शताब्दी में सैन्य शक्ति जितनी तलवारों पर निर्भर थी, उतनी ही मनोविज्ञान पर भी।
"दृश्यमान" सेनापति (The Visible Commander)
मध्यकालीन युद्धों में, यदि नेता गिर जाता या युद्ध क्षेत्र से गायब हो जाता, तो सेना अक्सर घबराकर भाग जाती थी। रज़िया ने इसका इस्तेमाल अपने पक्ष में किया। पर्दा त्याग कर और हाथी पर सवार होकर युद्ध के बीचों-बीच रहकर, उन्होंने खुद को अपनी सेना का अटल केंद्र बना लिया। उनकी उपस्थिति ने सैनिकों को यह संदेश दिया कि उनकी सुल्तान उनके साथ जोखिम उठा रही है, जिससे सैनिकों में अटूट वफादारी पैदा हुई।
खुफिया तंत्र और जासूसी
रज़िया "निवारक हमलों" (Pre-emptive strikes) में माहिर थीं। अपनी सेना भेजने से पहले, वह जासूसों के एक नेटवर्क (ज्यादातर गैर-तुर्क) का उपयोग स्थानीय लोगों की शिकायतों को समझने के लिए करती थीं। उनकी समस्याओं को हल करके या करों को कम करने का वादा करके, वह अक्सर यह सुनिश्चित कर लेती थीं कि स्थानीय जनता उन विद्रोही गवर्नरों का साथ न दे जिनके खिलाफ वह लड़ने जा रही थीं।
2. दिल्ली सल्तनत का सामाजिक जीवन
रज़िया जिस समाज पर शासन करती थी, वह संस्कृतियों, धर्मों और कठोर पदानुक्रमों का एक जटिल ताना-बाना था।
भारत-इस्लामी संस्कृति का मिलन
यह वह समय था जब फारसी संस्कृति भारतीय परंपराओं के साथ घुल-मिल रही थी। दिल्ली के व्यस्त बाजारों में फारसी, अरबी, तुर्की और हिंदुस्तानी के शुरुआती रूप सुनाई देते थे।
* वास्तुकला: रज़िया ने शहर के बुनियादी ढांचे में योगदान दिया, स्कूल, पुस्तकालय और सार्वजनिक कुएं बनवाए। वह दिल्ली को केवल एक सैन्य छावनी नहीं, बल्कि शिक्षा का केंद्र बनाना चाहती थीं।
* धार्मिक सहिष्णुता: जबकि शासक वर्ग मुस्लिम था, बहुसंख्यक प्रजा हिंदू थी। रज़िया ने अपने पिता के व्यावहारिक दृष्टिकोण का पालन किया—उन्होंने जबरन धर्म परिवर्तन के बजाय स्थिरता पर ध्यान केंद्रित किया। वह जानती थीं कि मंगोलों के खतरे से बचने के लिए उन्हें एक एकजुट देश की जरूरत है।
महिलाओं की भूमिका
रज़िया अपने समय की सबसे बड़ी अपवाद थीं। उस समय कुलीन महिलाओं के लिए 'ज़नाना' (जनानखाना) ही मानक था, जहाँ जीवन जालीदार पर्दों के पीछे बीतता था। "मर्दों की दुनिया" में कदम रखकर रज़िया ने सामाजिक ढांचे को चुनौती दी। उन्होंने साबित कर दिया कि "शासन करने का अधिकार" बुद्धि और न्याय पर आधारित है, लिंग पर नहीं।
3. मंगोलों की छाया: एक मौन खतरा
रज़िया के अपने रईसों के प्रति सख्त होने का एक बड़ा कारण उत्तर-पश्चिम से आने वाला भयानक खतरा था: मंगोल। चंगेज खान के उत्तराधिकारी भारत के दरवाजों पर दस्तक दे रहे थे। रज़िया जानती थी कि एक विभाजित सल्तनत को मंगोल खा जाएंगे। उनका सैन्य ध्यान हमेशा उत्तर-पश्चिमी सीमा (आधुनिक पंजाब और पाकिस्तान) को सुरक्षित रखने पर रहा। उनका पतन विदेशी आक्रमणकारियों से नहीं, बल्कि 'चालीसा' के आंतरिक स्वार्थों के कारण हुआ।
अंतिम रहस्य: उनकी कब्र
मृत्यु के बाद भी रज़िया एक रहस्य बनी हुई हैं। उनके दफन स्थल होने का दावा तीन अलग-अलग स्थानों के लिए किया जाता है:
* दिल्ली (बुलबुली खाना मोहल्ला): सबसे व्यापक रूप से स्वीकृत स्थल।
* कैथल (हरियाणा): जहाँ कथित तौर पर उनकी हत्या हुई थी।
* टोंक (राजस्थान): जहाँ कुछ स्थानीय लोककथाएं कहती हैं कि वह बच निकली थीं और उन्होंने अपना शेष जीवन वहीं बिताया।
उनकी कब्र को लेकर यह विवाद यह दर्शाता है कि वह कैसी शख्सियत थीं—एक ऐसी महिला जिसे इतिहास की दीवारें कभी आसानी से बांध नहीं पाईं।