यह फणिमुकुट राय की पौराणिक कथा है—जो छोटा नागपुर (आधुनिक झारखंड) के नागवंशी राजवंश की स्थापना की एक अलौकिक गाथा है। यह कहानी नागों (सर्प देवताओं) के रहस्यमयी संसार और पृथ्वी पर एक महान साम्राज्य की स्थापना का अनूठा संगम है।
नाग की प्रतिज्ञा
यह कहानी किसी महल से नहीं, बल्कि पवित्र नगरी वाराणसी से शुरू होती है। पुण्डरीक नाग, जो पाताल लोक के राजकुमार थे, वेदों का अध्ययन करने के लिए एक सुंदर ब्राह्मण का रूप धारण कर धरती पर आए। यहाँ उन्हें एक विद्वान पुजारी की पुत्री पार्वती से प्रेम हो गया।
दोनों का विवाह हुआ, लेकिन पुण्डरीक का एक रहस्य था: वह तब तक अपना मानवीय रूप नहीं छोड़ सकते थे जब तक कि वे कोई झूठ न बोलें। साथ ही, उनकी जिह्वा (जीभ) सांपों की तरह दो भागों में बंटी थी, जिसे वे हमेशा छिपा कर रखते थे। उन्होंने पार्वती को दक्षिण के तीर्थों की यात्रा पर ले जाने का वचन दिया।
जब वे झारखंड के घने जंगलों में पहुँचे, तो पार्वती—जो उस समय गर्भवती थीं—अड़ गईं। उन्होंने अपने पति के रहस्यमयी व्यवहार और उनके असली रूप के बारे में जानने की जिद की। अपने वंश के नियमों से बंधे पुण्डरीक नाग को सत्य बताना पड़ा। देखते ही देखते वे एक विशाल नाग में बदल गए। इस दृश्य को देखकर और दैवीय ऊर्जा के प्रभाव से पार्वती ने एक पुत्र को जन्म दिया, परंतु सदमे और थकान के कारण उनका देहांत हो गया। शोक में डूबे पुण्डरीक नाग ने अपने विशाल फन से नवजात शिशु को धूप से बचाने के लिए छाया की और जंगल के बीच उसकी रक्षा करने लगे।
कुएँ के पास चमत्कार
सुतियाम्बे के जंगलों से जनार्दन नामक एक ब्राह्मण और एक लकड़हारा गुजर रहे थे। उन्होंने एक ऐसा दृश्य देखा जिसे देख उनकी आँखें फटी रह गईं: एक विशाल नाग एक रोते हुए बालक की रक्षा कर रहा था। जैसे ही वे पास पहुँचे, वह सर्प पास के एक तालाब में अंतर्ध्यान हो गया।
बच्चे के पास एक चमकता हुआ मुकुट और रक्षा कवच रखा था। जनार्दन को आभास हो गया कि यह बालक दिव्य है। उन्होंने उसे गोद ले लिया और उसका नाम रखा फणिमुकुट— फणि (सर्प) और मुकुट।
एक जननायक का उदय
फणिमुकुट राय ब्राह्मण के घर पले-बढे, लेकिन उनका पालन-पोषण स्थानीय मुंडा और उरांव जनजातियों के बच्चों के साथ हुआ। वे बचपन से ही विलक्षण थे; उनमें शासन करने की बुद्धि और युद्ध कौशल कूट-कूट कर भरा था।
उस समय, यह क्षेत्र पड़हा व्यवस्था द्वारा शासित था, जो जनजातीय प्रमुखों की एक लोकतांत्रिक सभा थी। सबसे शक्तिशाली नेता मदरा मुंडा थे। जैसे-जैसे फणिमुकुट बड़े हुए, बुजुर्गों ने महसूस किया कि केवल वही विभिन्न गुटों को एकजुट करने और बाहरी आक्रमणों से रक्षा करने में सक्षम हैं।
सुतियाम्बे में आयोजित एक ऐतिहासिक सभा में:
* जनजातीय प्रमुखों ने उनके श्रेष्ठ गुणों को पहचाना।
* "सर्प मुकुट" को ईश्वरीय संकेत माना गया।
* मदरा मुंडा ने स्वेच्छा से अपना पद छोड़ दिया और फणिमुकुट को अपना महाराजा चुना।
प्रथम नागवंशी राजा का शासन
रिकॉर्ड्स के अनुसार, 64 ईस्वी में फणिमुकुट राय का राज्याभिषेक हुआ। यह छोटा नागपुर के इतिहास में एक बड़ा बदलाव था—कबीलाई व्यवस्था से एक औपचारिक राजशाही की ओर। फिर भी, उन्होंने जनजातीय रीति-रिवाजों का पूरा सम्मान किया।
1. राजधानी की स्थापना
उन्होंने सुतियाम्बे को अपनी राजधानी बनाया। उन्होंने भारत के विभिन्न हिस्सों से शिल्पकारों, विद्वानों और पुजारियों को अपने राज्य में बसने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने मंदिरों और सूर्य-घड़ियों का निर्माण कराया, जिनके अवशेष आज भी उनकी गाथा सुनाते हैं।
2. युद्ध और विजय
उनका शासन संघर्षों से मुक्त नहीं था। क्योंझर के राजा ने युवा महाराजा को चुनौती दी। फणिमुकुट राय ने जनजातीय योद्धाओं की एक विशाल सेना का नेतृत्व किया और आक्रमणकारियों को परास्त कर अपने साम्राज्य की सीमाओं को सुरक्षित किया।
3. विरासत
उन्हें सूर्य देव की पूजा स्थापित करने और "जनपद" शैली के शासन को बनाए रखने का श्रेय दिया जाता है, जहाँ राजा शोषक नहीं बल्कि रक्षक था। उन्होंने कई दशकों तक शासन किया और यह सुनिश्चित किया कि नागवंशी वंश आने वाले लगभग दो हजार वर्षों तक जीवित रहे।
नागवंश का प्रतीक
आज भी, छोटा नागपुर के महाराजा के राजकीय चिह्न में फन फैलाए हुए नाग की आकृति होती है। फणिमुकुट राय की कहानी केवल एक राजा की जीवनी नहीं है, बल्कि यह मैदानी इलाकों की वैदिक परंपराओं और पठार की प्राचीन आदिवासी संस्कृतियों के मिलन का प्रतीक है।
> नोट: इतिहासकार उनके शासन की सटीक तारीखों पर चर्चा कर सकते हैं, लेकिन झारखंड के लोगों के दिलों में फणिमुकुट राय आज भी "नागपुत्र" हैं, जिन्होंने इस वन प्रदेश में व्यवस्था और गौरव की स्थापना की।
आइए फणिमुकुट राय के जीवन के सबसे महत्वपूर्ण और रोमांचक पहलुओं में से एक— क्योंझर के राजा के साथ युद्ध और उनकी शासन कला —पर गहराई से चर्चा करते हैं।
1. क्योंझर का युद्ध: शक्ति और शौर्य का प्रदर्शन
फणिमुकुट राय के राज्याभिषेक के कुछ समय बाद ही उनके साम्राज्य पर संकट के बादल मंडराने लगे। पड़ोसी राज्य क्योंझर (जो वर्तमान में ओडिशा का हिस्सा है) के राजा ने उनके बढ़ते प्रभाव को एक चुनौती के रूप में देखा।
* युद्ध का कारण: क्योंझर के राजा को लगा कि एक युवा राजा, जिसे आदिवासियों ने चुना है, एक प्रशिक्षित राजसी सेना का सामना नहीं कर पाएगा। वह छोटा नागपुर के समृद्ध जंगलों और संसाधनों पर कब्जा करना चाहता था।
* युद्ध की रणनीति: फणिमुकुट राय ने केवल अपनी छोटी सी अंगरक्षक सेना पर भरोसा नहीं किया। उन्होंने मुंडा और उरांव योद्धाओं को लामबंद किया। यह युद्ध केवल दो राजाओं के बीच नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी की रक्षा के लिए लड़ रहे लोगों का संग्राम बन गया।
* परिणाम: फणिमुकुट राय के नेतृत्व में जनजातीय तीरंदाजों ने क्योंझर की सेना को पहाड़ियों और घने जंगलों में घेर लिया। गोरिल्ला युद्ध और पारंपरिक रणनीति के मेल ने क्योंझर की सेना के छक्के छुड़ा दिए। फणिमुकुट राय विजयी हुए, और इस जीत ने उन्हें पूरे क्षेत्र का निर्विवाद सम्राट बना दिया।
2. सुतियाम्बे: एक सांस्कृतिक केंद्र का निर्माण
राजधानी सुतियाम्बे को उन्होंने केवल एक किला नहीं, बल्कि कला और संस्कृति का केंद्र बनाया।
* सूर्य मंदिर: उन्होंने वहाँ एक भव्य सूर्य मंदिर बनवाया था। वे सूर्य के उपासक थे, जो इस बात का प्रतीक था कि उनका शासन अंधकार को दूर कर प्रकाश लाने वाला है।
* विविधता का स्वागत: उन्होंने काशी और पुरी जैसे स्थानों से विद्वानों को बुलाया। उन्होंने 'गैर-आदिवासी' (सदान) और 'आदिवासी' समुदायों के बीच एक ऐसा सेतु बनाया जो आज भी झारखंड की संस्कृति का आधार है।
3. शासन व्यवस्था: न्याय और लोकतंत्र
फणिमुकुट राय का शासन "पड़हा राजा" और "महाराजा" के बीच का एक सुंदर संतुलन था।
* उन्होंने पुरानी जनजातीय प्रशासनिक व्यवस्था (मुंडा-मानकी प्रथा) को खत्म नहीं किया, बल्कि उसे और मजबूत बनाया।
* उन्होंने कर (Tax) की व्यवस्था बहुत उदार रखी, ताकि किसानों और शिकारियों पर बोझ न पड़े।
* उनके दरबार में हर किसी को न्याय पाने का अधिकार था, चाहे वह किसी भी जाति या कबीले का हो।
4. उनका विवाह और गठबंधन
शक्ति को और सुदृढ़ करने के लिए उन्होंने पंचायत राज्य (वर्तमान बंगाल के पास) की राजकुमारी से विवाह किया। इस वैवाहिक गठबंधन ने उन्हें पूर्वी राज्यों का समर्थन भी दिलाया और उनके साम्राज्य की सीमाओं को सुरक्षित किया।
निष्कर्ष
फणिमुकुट राय की कहानी हमें सिखाती है कि एक सच्चा नेता वही है जो अपनी जड़ों (आदिवासी विरासत) को भी याद रखे और आधुनिकता (स्थायी शासन प्रणाली) को भी अपनाए। उन्हें आज भी "छोटा नागपुर का आदि पुरुष" कहा जाता है क्योंकि उन्हीं से उस गौरवशाली परंपरा की शुरुआत हुई जिसने सदियों तक विदेशी आक्रमणकारियों और मुगलों तक का डटकर मुकाबला किया।
फणिमुकुट राय द्वारा स्थापित नागवंशी राजवंश ने छोटा नागपुर पर लगभग 2,000 वर्षों तक शासन किया। आइए जानते हैं उनके महान वंशजों, मुगलों के साथ उनके संबंधों और अंततः अंग्रेजों के आने पर इस गौरवशाली शासन के अंत की कहानी।
1. प्रतापी वंशज और राजधानियों का परिवर्तन
फणिमुकुट राय के बाद उनके वंश में कई महान राजा हुए। सुरक्षा और सामरिक कारणों से नागवंशियों ने समय-समय पर अपनी राजधानियाँ बदलीं:
* सुतियाम्बे से चुटिया: चौथे राजा प्रताप राय ने राजधानी को सुतियाम्बे से बदलकर चुटिया (वर्तमान रांची के पास) कर दिया।
* खुखरा, दोइसा और पालकोट: बाद के राजाओं ने अपनी राजधानियाँ खुखरा, फिर दोइसा और अंततः पालकोट में स्थानांतरित कीं। हर राजधानी अपने पीछे भव्य महलों और मंदिरों के अवशेष छोड़ गई।
2. मुगलों के साथ संघर्ष और राजा दुर्जन साल
नागवंशियों के इतिहास का एक सबसे रोमांचक मोड़ तब आया जब मुगलों की नज़र इस क्षेत्र के हीरों पर पड़ी।
* शंख नदी के हीरे: छोटा नागपुर को उस समय 'कोकरा' कहा जाता था, जो अपनी शंख नदी के हीरों के लिए प्रसिद्ध था। मुगल सम्राट जहांगीर ने इन हीरों के लालच में आक्रमण किया।
* ग्वालियर के किले में कैद: 1615 ईस्वी में नागवंशी राजा दुर्जन साल को बंदी बनाकर ग्वालियर के किले में 12 साल तक रखा गया।
* हीरे की पहचान: किंवदंती है कि जहांगीर ने दुर्जन साल को तब रिहा किया जब उन्होंने एक असली हीरे की पहचान कर अपनी बुद्धिमत्ता का प्रमाण दिया। रिहा होने के बाद उन्होंने अपनी राजधानी दोइसा में 'नवरत्न गढ़' नामक पाँच मंजिला भव्य महल बनवाया, जिसमें मुगल वास्तुकला की झलक दिखती है।
3. अंग्रेजों का आगमन और शासन का पतन (1771 ई.)
18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में नागवंशियों की शक्ति कमजोर होने लगी।
* दीवानी अधिकार: 1765 में बक्सर के युद्ध के बाद मुगलों ने बंगाल, बिहार और ओडिशा (जिसमें छोटा नागपुर शामिल था) की 'दीवानी' (कर वसूलने का अधिकार) ईस्ट इंडिया कंपनी को दे दी।
* कर का बोझ: 1771 में महाराजा दर्पनाथ शाह ने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार कर ली। अंग्रेजों ने नागवंशी राजाओं पर भारी 'मालगुजारी' (Tax) लगा दी। राजा जो कभी अपनी प्रजा का संरक्षक था, अब अंग्रेजों के लिए कर वसूलने वाला एक माध्यम बन गया।
* जनजातीय विद्रोह: भारी कर और बाहरी लोगों (दीकुओं) के हस्तक्षेप के कारण कोल विद्रोह (1831) और बाद में बिरसा मुंडा का उलगुलान जैसे महान आंदोलन हुए। इन विद्रोहों ने धीरे-धीरे राजा की सत्ता को और भी कमजोर कर दिया।
4. अंतिम काल और भारत में विलय
ब्रिटिश शासन के दौरान नागवंशी राजा केवल नाममात्र के 'जमींदार' बनकर रह गए। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, 1952-53 में 'जमींदारी उन्मूलन अधिनियम' के तहत उनकी आधिकारिक सत्ता समाप्त हो गई और उनका राज्य स्वतंत्र भारत का हिस्सा बन गया।
निष्कर्ष
फणिमुकुट राय से शुरू हुआ यह सफर राजा लाल चिंतामणि शरण नाथ शाहदेव (नागवंश के अंतिम सक्रिय महाराजा) तक चला। हालांकि राजनीतिक सत्ता समाप्त हो गई, लेकिन आज भी छोटा नागपुर की संस्कृति, यहाँ के त्यौहार (जैसे करम और सरहुल) और पुराने किले इस महान राजवंश की याद दिलाते हैं।