शेर-ए-पंजाब, महाराजा रणजीत सिंह का शासनकाल

शेर-ए-पंजाब, महाराजा रणजीत सिंह का शासनकाल

शेर-ए-पंजाब, महाराजा रणजीत सिंह का शासनकाल।
कल्पना कीजिए 18वीं शताब्दी के अंत का समय। पंजाब छोटे-छोटे गुटों (मिसलों) में बँटा हुआ था जो आपस में लड़ रहे थे और अफ़गान आक्रमणकारी लगातार इस भूमि को लूट रहे थे। ऐसे अंधेरे समय में एक 19 साल के युवक का उदय हुआ, जिसने बिखरे हुए पंजाब को एक विशाल और शक्तिशाली साम्राज्य में बदल दिया।
महाराजा रणजीत सिंह: एक साम्राज्य की नींव
रणजीत सिंह केवल 12 वर्ष के थे जब उनके पिता का निधन हो गया। चेचक की वजह से उनकी एक आँख की रोशनी चली गई थी, लेकिन उनकी दृष्टि (Vision) इतनी साफ़ थी कि उन्होंने देख लिया था कि बिना एकता के पंजाब सुरक्षित नहीं है।
1799 में, उन्होंने लाहौर पर विजय प्राप्त की और उसे अपनी राजधानी बनाया। 1801 में, बैसाखी के दिन, उन्हें 'महाराजा' घोषित किया गया। लेकिन उनकी महानता इसमें थी कि उन्होंने कभी अपने नाम का सिक्का नहीं चलाया, बल्कि 'नानकशाही' सिक्के चलाए। उन्होंने खुद को कभी राजा नहीं माना, बल्कि खुद को 'खालसा पंथ का सेवक' कहा।
एक अनोखा शासन: जहाँ कोई भेदभाव नहीं था
महाराजा रणजीत सिंह का दरबार दुनिया के सबसे धर्मनिरपेक्ष (Secular) दरबारों में से एक था। उनके सबसे भरोसेमंद विदेश मंत्री एक मुसलमान (फ़कीर अजीजुद्दीन) थे और उनके सेनापति एक ब्राह्मण (दीवान मोखम चंद) थे।
कहा जाता है कि महाराजा अक्सर वेश बदलकर अपनी प्रजा का हाल जानने निकलते थे। उनके राज में किसी को भी मृत्युदंड (Death Penalty) नहीं दिया गया, जो उस क्रूर समय में एक अविश्वसनीय बात थी। उन्होंने अमृतसर के हरमंदिर साहिब की सेवा की और उस पर सोना चढ़वाया, जिसके बाद उसे 'स्वर्ण मंदिर' (Golden Temple) कहा जाने लगा। साथ ही, उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर को भी भारी मात्रा में सोना दान किया।
अजेय सेना: सरकार-ए-खालसा
रणजीत सिंह ने अपनी सेना को आधुनिक बनाने के लिए फ्रांसीसी और इतालवी सेनापतियों को नियुक्त किया। उनकी सेना 'फौज-ए-खास' एशिया की सबसे शक्तिशाली सेनाओं में से एक मानी जाती थी। उन्होंने अफ़गान लुटेरों को न केवल पंजाब से बाहर निकाला, बल्कि उनके अपने इलाकों (पेशावर और खैबर दर्रे) तक उन्हें खदेड़ दिया—ऐसा करने वाले वे इतिहास के पहले भारतीय शासक थे।
उनके प्रसिद्ध सेनापति हरि सिंह नलवा का नाम सुनकर अफ़गानों के पसीने छूट जाते थे। उन्हीं के समय में प्रसिद्ध 'कोहिनूर हीरा' पंजाब की शान बना।
एक युग का अंत
1839 में जब महाराजा की मृत्यु हुई, तो ऐसा लगा मानो पंजाब का सूरज ढल गया। उनके बाद उत्तराधिकार के लिए आपसी कलह शुरू हो गई और अंततः 1849 में अंग्रेजों ने धोखे और साज़िशों के ज़रिए पंजाब को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया।
पंजाब के लोगों के लिए महाराजा रणजीत सिंह का राज आज भी 'स्वर्ण युग' कहलाता है क्योंकि वह पहली बार था जब पंजाबियों ने अपनी ज़मीन पर अपना शासन देखा था।

ये पंजाबी लोककथाओं की दो सबसे प्रतिष्ठित कहानियाँ हैं—एक शानदार कूटनीतिक सूझबूझ की और दूसरी अद्वितीय साहस और वीरता की।
1. कोहिनूर की कहानी: रोशनी का पर्वत
कोहिनूर का पंजाब पहुँचने का किस्सा सत्ता के बदलते समीकरणों और एक महाराजा की पैनी समझ की दास्तान है।
1813 तक, यह हीरा अफगानिस्तान के निर्वासित राजा शाह शुजा के पास था। वह अपने देश से भागकर लाहौर में शरण लेने आया था। महाराजा रणजीत सिंह जानते थे कि शाह के पास इतिहास का सबसे प्रसिद्ध हीरा है। उन्होंने शाह को सुरक्षा का वचन दिया, लेकिन बदले में एक शर्त रखी।
शाह इस पत्थर को छोड़ने में हिचकिचा रहा था, जिसे दशकों पहले नादिर शाह ने दिल्ली से लूटा था। उसने पहले महाराजा को कांच का एक उच्च गुणवत्ता वाला नकली टुकड़ा भेजकर धोखा देने की कोशिश की। लेकिन रणजीत सिंह के जौहरियों ने तुरंत इस धोखे को पकड़ लिया।
अंत में, महाराजा व्यक्तिगत रूप से शाह शुजा से मिलने पहुँचे। एक घंटे की तनावपूर्ण चुप्पी के बाद, शाह को समझ आ गया कि उसके पास कोई विकल्प नहीं है। उसने वह हीरा रणजीत सिंह के सामने रख दिया।
> महाराजा ने पूछा, "इस पत्थर की कीमत क्या है?"
> शाह की पत्नी ने प्रसिद्ध जवाब दिया, "यदि एक शक्तिशाली व्यक्ति चार पत्थर फेंके—एक उत्तर, एक दक्षिण, एक पूर्व, एक पश्चिम—और पाँचवाँ पत्थर हवा में फेंके, और उनके बीच के स्थान को सोने से भर दिया जाए, तो भी वह कोहिनूर के मूल्य के बराबर नहीं होगा।"

रणजीत सिंह ने राजकीय समारोहों के दौरान इस हीरे को अपनी बाजू पर पहना, जिससे यह सरकार-ए-खालसा की संप्रभुता का प्रतीक बन गया। यह 1849 तक पंजाब की शान बना रहा, जब अंग्रेजों ने 'लाहौर की संधि' के तहत इसे छीन लिया।
2. हरि सिंह नलवा की किंवदंती: "बाघ का वध करने वाला"
यदि रणजीत सिंह साम्राज्य के 'मस्तिष्क' थे, तो हरि सिंह नलवा उसकी 'तलवार' थे। वे अपने समय के सबसे खूंखार जनरल थे और आज भी उत्तर-पश्चिमी सीमा पर उनका नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है।
उन्हें 'नलवा' नाम कैसे मिला
उनका असली नाम हरि सिंह उप्पल था। एक दिन शिकार के दौरान, अचानक एक बाघ ने उन पर हमला कर दिया। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, बाघ ने उन्हें दबोच लिया था। अपनी बंदूक की परवाह किए बिना, हरि सिंह ने अपने नंगे हाथों से बाघ के जबड़ों को पकड़ लिया और उसकी गर्दन मरोड़ दी। महाराजा, जो इस अलौकिक शक्ति के गवाह थे, ने उनकी तुलना पौराणिक राजा नल (जो अपनी बहादुरी के लिए जाने जाते थे) से की, और इस तरह वे "नलवा" बन गए।
अफगानों का खौफ
सदियों से आक्रमणकारी खैबर दर्रे से भारत लूटने आते थे। हरि सिंह नलवा ने उस प्रवाह को उलट कर इतिहास बदल दिया। उन्होंने दर्रे के मुहाने पर जमरूद जैसे किले बनवाए और पेशावर पर विजय प्राप्त की।
उनका डर इतना था कि कहा जाता है कि अफगान माताएं अपने बच्चों को चुप कराने के लिए उनका नाम लेती थीं, और कहती थीं, "हुरिया आ गया" (हरि सिंह आ गया है)।
अंतिम बलिदान
1837 में जमरूद की लड़ाई के दौरान नलवा घातक रूप से घायल हो गए। मरते समय भी उन्हें पता था कि अगर अफगान सेना को उनकी मौत की खबर मिली, तो वे हमला कर सिख सेना को कुचल देंगे। उन्होंने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि उनके शरीर को किले की प्राचीर (ऊंची दीवार) पर इस तरह लटका दिया जाए जैसे वे अभी भी जीवित हों और देख रहे हों। कई दिनों तक, अफगान सेना उस "खामोश जनरल" के डर से पीछे हटी रही, जिससे सिख कुमुक (Reinforcements) को पहुँचने और किले को बचाने का समय मिल गया।
3. हड़प्पा का रहस्य: कांस्य युग का शहर
अब 4,500 साल पीछे चलते हैं। यदि आप हड़प्पा (आधुनिक साहीवाल, पंजाब के पास) की गलियों में टहलते, तो आपको यह महसूस नहीं होता कि आप प्राचीन दुनिया में हैं; आपको लगेगा कि आप किसी आधुनिक शहर में हैं।
नियोजन का उत्कृष्ट नमूना
जब बाकी दुनिया मिट्टी की झोपड़ियों में रहती थी, तब हड़प्पा के पंजाबी दो मंजिला ईंटों के घरों में रहते थे। उनके पास था:
 * इनडोर प्लंबिंग: हर घर में नहाने की जगह और शौचालय था।
 * दुनिया की पहली जल निकासी: सड़कों के नीचे ढकी हुई नालियाँ चलती थीं—स्वच्छता का वह स्तर जो यूरोप को अगले 3,000 वर्षों तक हासिल नहीं हुआ।
 * मानकीकृत बाट: उनका व्यापार इतना सटीक था कि वे हजारों मील तक एक जैसे वजन और माप के पत्थरों का उपयोग करते थे।
सबसे बड़ा रहस्य
मिस्र या मेसोपोटामिया के विपरीत, हड़प्पावासियों ने भव्य राजाओं की मूर्तियाँ या खूनी युद्धों के दृश्य नहीं छोड़े। वे व्यापारियों और कारीगरों का समाज प्रतीत होते थे। बच्चे मिट्टी की सीटियों और खिलौनों से खेलते थे।
सबसे बड़ा रहस्य उनकी लिपि है। हमारे पास यूनिकॉर्न और बैलों की सुंदर नक्काशी वाली हजारों मुहरें हैं, जिनके ऊपर अजीब से संकेत बने हैं। आज तक कोई भी यह नहीं पढ़ पाया है कि हड़प्पावासियों ने क्या लिखा था। जब 1900 ईसा पूर्व के आसपास नदियाँ बदलीं या जलवायु बदली, तो वे अपने शहरों को छोड़कर चले गए, और पंजाब की इस शहरी प्रतिभा की कहानी धूल में दब गई।

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