ज़ब्ती प्रणाली का उदय

ज़ब्ती प्रणाली का उदय

आगरा के विशाल मैदानों में सूरज ढल रहा था, जिसकी सुनहरी किरणें 'दीवान-ए-खास' के आंगन में लंबी परछाइयां बना रही थीं। महल की हवा गुलाब जल की खुशबू और दरबारियों की दबी फुसफुसाहट से भरी थी। लेकिन उस कमरे के केंद्र में, एक साधारण मगर भव्य सिंहासन पर बैठे जलाल-उद्दीन मुहम्मद अकबर—तीसरे मुगल सम्राट—की रुचि आज न तो कविता में थी और न ही किसी नए सैन्य अभियान में।
उनकी रुचि आंकड़ों में थी।
उनके बगल में एक ऐसा व्यक्ति खड़ा था जिसका मस्तिष्क बही-खातों और तर्क की भूलभुलैया जैसा था: राजा टोडरमल। यह कहानी है कि कैसे इन दो पुरुषों ने एक साम्राज्य की नींव को फिर से लिखा, उसे अराजक अंदाजों से हटाकर एक वैज्ञानिक चमत्कार में बदल दिया, जिसे 'ज़ब्ती प्रणाली' के रूप में जाना गया।
अध्याय 1: पुरानी व्यवस्था की अराजकता
अकबर की क्रांति को समझने के लिए, उस अव्यवस्था को समझना जरूरी है जो उन्हें विरासत में मिली थी। उनके शासन के शुरुआती वर्षों में, साम्राज्य का राजस्व एक जुए की तरह था। कर संग्रहकर्ता (आमिल) खेतों को देखकर उपज का अनुमान लगाते और अपनी मर्जी से हिस्सा मांगते थे।
यदि बारिश नहीं होती, तो किसान भूखे मर जाते, जबकि कर संग्रहकर्ता फिर भी अपनी वसूली पर अड़े रहते। यदि फसल बंपर होती, तो अक्सर राज्य को उसका उचित हिस्सा नहीं मिलता था क्योंकि यह जानने का कोई तरीका नहीं था कि वास्तव में कितनी उपज हुई है। उस समय केवल एक ही चीज लगातार बढ़ रही थी: भ्रष्टाचार।
अकबर ने महसूस किया कि एक स्थिर साम्राज्य रेत की ढेरी पर नहीं बनाया जा सकता। अकबर ने एक बार टोडरमल से कहा था, "वह राजा जो अपनी मिट्टी की नब्ज नहीं पहचानता, उस कप्तान की तरह है जो समुद्र की गहराई नहीं जानता।"
अध्याय 2: माप की रस्सी और बांस का डंडा
१५७० में, अकबर ने टोडरमल को एक जनादेश दिया: सब कुछ नापो।
इससे पहले, अधिकारी जमीन मापने के लिए भांग की रस्सियों का उपयोग करते थे। लेकिन भांग की रस्सी गीली होने पर खिंच जाती थी और सूखने पर सिकुड़ जाती थी—यह बेईमान अधिकारियों के लिए किसानों को ठगने का एक बेहतरीन औजार था।
टोडरमल ने 'तनाब' की शुरुआत की, जो लोहे के छल्लों से जुड़ी बांस की छड़ियों से बना एक मापक दंड था। यह न मुड़ता था, न खिंचता था—यह अडिग और सटीक था।
सर्वेक्षक पूरे भारत-गंगा के मैदानों में फैल गए। उन्होंने न केवल खेतों के आकार को मापा, बल्कि उर्वरता के आधार पर मिट्टी को चार अलग-अलग श्रेणियों में वर्गीकृत किया:
1. पोलज: वह भूमि जिस पर हर साल खेती होती थी (सबसे उपजाऊ)।
2. परौती: वह भूमि जिसे उसकी शक्ति वापस पाने के लिए एक या दो साल के लिए खाली छोड़ दिया जाता था।
3. चाचर: वह भूमि जिसे तीन से चार साल तक खाली छोड़ दिया जाता था।
4. बंजर: खेती के अयोग्य भूमि, जो अक्सर रेतीली या पथरीली होती थी।
भूमि का वर्गीकरण करके, अकबर ने यह सुनिश्चित किया कि पथरीली जमीन वाले किसान पर उतना ही कर न लगाया जाए जितना कि नदी के किनारे की उपजाऊ जमीन वाले किसान पर।
अध्याय 3: दस साल का सच (दहसाला)
माप तो आधी लड़ाई थी। कीमतें बदलती रहती थीं। एक साल गेहूं महंगा हो सकता था, तो अगले साल बाजार में अधिकता के कारण वह सस्ता हो जाता था।
टोडरमल का सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक 'दहसाला प्रणाली' थी, जिसे 1580 के आसपास लागू किया गया। उन्होंने एक विशाल डेटा-संग्रह परियोजना का आदेश दिया। दस वर्षों (1570-1580) तक, राज्य ने हर जिले में हर फसल की सटीक उपज और प्रचलित स्थानीय कीमतों का रिकॉर्ड रखा।
फिर उन्होंने इन दस वर्षों का औसत निकाला। यह "औसत" राज्य की मांग का आधार बना। सरकारी हिस्सा कुल उपज का एक-तिहाई (१/३) तय किया गया।
इससे भारतीय उपमहाद्वीप में वह चीज आई जो सदियों से नहीं देखी गई थी: अनुमान योग्यता। एक किसान को पता होता था कि उसे कितना भुगतान करना है, चाहे उस वर्ष बाजार की कीमतें कितनी भी ऊपर-नीचे क्यों न हों।
अध्याय 4: ज़ब्ती प्रणाली का उदय
इस पूरी प्रक्रिया—माप, वर्गीकरण और दस साल के औसत—को ज़ब्ती प्रणाली कहा गया। यह सम्राट और किसान (रैयत) के बीच एक अनुबंध था।
इसे आधिकारिक बनाने के लिए दो दस्तावेजों का आदान-प्रदान किया गया:
 * पट्टा: राज्य द्वारा किसान को दिया गया दस्तावेज, जिसमें उसकी जमीन और उसके द्वारा देय कर का विवरण होता था।
 * कबूलियत: किसान द्वारा हस्ताक्षरित एक "सहमति पत्र", जिसमें वह अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करता था।
अकबर ने इस बात पर भी जोर दिया कि कर नकद में दिया जाए, न कि अनाज के रूप में। इसने अर्थव्यवस्था में मुद्रा के प्रचलन को बढ़ावा दिया, जिससे पूरे साम्राज्य में व्यापार और मंडी कस्बों का विकास हुआ।
| भूमि की श्रेणी | खेती की आवृत्ति | कर का बोझ |
|---|---|---|
| पोलज | सालाना | उच्च (मानक १/३) |
| परौती | हर १-२ साल में | मध्यम |
| चाचर | हर ३-४ साल में | कम (पुनरुद्धार को बढ़ावा देने के लिए) |
| बंजर | कभी-कभार | न्यूनतम (सफाई को बढ़ावा देने के लिए) |
अध्याय 5: मानवीय दृष्टिकोण
अकबर केवल एक कठोर गणितज्ञ नहीं थे। वह जानते थे कि प्रकृति चंचल है। उन्होंने अपने प्रांतीय गवर्नरों (सूबेदारों) को खड़े आदेश जारी किए थे:
> "अकाल या बाढ़ के समय, कर संग्रहकर्ता का हाथ रुक जाना चाहिए। किसानों को बीज और मवेशी खरीदने के लिए 'तकावी' (आपातकालीन ऋण) प्रदान करें। यदि फसल बर्बाद हो जाती है, तो कर माफ कर दिया जाना चाहिए।"

वह किसान को साम्राज्य के "खजाने" के रूप में देखते थे। यदि किसान समृद्ध होता, तो मुगल सिंहासन सुरक्षित था। यदि किसान टूट जाता, तो सिंहासन गिर जाता।
अध्याय 6: बही-खातों की विरासत
१६०५ में अकबर की मृत्यु के समय तक, मुगल साम्राज्य दुनिया की सबसे धनी इकाई थी, जिसका वैश्विक जीडीपी में लगभग २५% हिस्सा था। यह केवल हीरे या रेशम की वजह से नहीं था; यह टोडरमल के बही-खातों की सटीकता के कारण था।
यह प्रणाली एकदम दोषमुक्त नहीं थी—स्थानीय जमींदार अभी भी गरीबों का शोषण करने के तरीके ढूंढ लेते थे—लेकिन इसने प्रशासनिक सूझबूझ का वह स्तर प्रदान किया जिसका अध्ययन और अनुकूलन तीन शताब्दियों बाद ब्रिटिश राज ने भी किया।
अकबर की राजस्व प्रणाली की कहानी इस बात की कहानी है कि कैसे एक योद्धा-राजा ने अपनी तलवार नीचे रखकर माप की छड़ी उठा ली, और यह साबित कर दिया कि किसी राज्य की असली ताकत इसमें नहीं है कि वह क्या छीनता है, बल्कि इसमें है कि वह कितनी ईमानदारी से गणना करता है।

उन कंधों की कहानी जिन्होंने व्यवस्था को संभाला
सिर्फ नियम बना देना काफी नहीं था; उन्हें जमीन पर लागू करने के लिए अकबर ने एक मजबूत प्रशासनिक ढांचा तैयार किया। हर गांव और जिले में अधिकारियों की एक कड़ी थी:
1. आमिलगुज़ार (Amilguzar) - जिले का रक्षक
यह जिले का मुख्य राजस्व अधिकारी होता था। उसका काम सिर्फ कर वसूलना नहीं था, बल्कि एक पिता की तरह किसानों की देखभाल करना भी था। अकबर के निर्देश थे कि आमिलगुज़ार को "किसानों के साथ एक मित्र की तरह व्यवहार करना चाहिए" और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि खेती के लिए ऋण (तकावी) समय पर मिले।
2. पटवारी (Patwari) - गांव का मुंशी
पटवारी गांव के स्तर पर सबसे महत्वपूर्ण कड़ी था। उसके पास हर खेत का नक्शा, मिट्टी की किस्म और पिछले सालों की उपज का पूरा हिसाब होता था। आज भी भारत के कई हिस्सों में 'पटवारी' शब्द उसी सम्मान और जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल होता है।
3. मुकद्दम (Muqaddam) - गांव का मुखिया
यह गांव का प्रधान होता था जो सरकार और किसानों के बीच एक पुल का काम करता था। कर वसूली में मदद करने के बदले उसे उपज का एक छोटा हिस्सा मिलता था।
दिल्ली सल्तनत और अकबर की व्यवस्था में अंतर
अकबर से पहले, अलाउद्दीन खिलजी और शेरशाह सूरी जैसे शासकों ने भी लगान सुधार के प्रयास किए थे, लेकिन अकबर की व्यवस्था उनसे कहीं आगे निकल गई। यहाँ मुख्य अंतर दिए गए हैं:
1. अनुमान बनाम वास्तविकता
 * सल्तनत काल: अधिकतर 'बटाई' (फसल कटने के बाद बंटवारा) या 'कंकूत' (खड़ी फसल को देखकर अनुमान लगाना) पर निर्भर था। इसमें भ्रष्टाचार की बहुत गुंजाइश थी।
 * अकबर: 'ज़ब्ती' और 'दहसाला' ने अनुमान को खत्म कर दिया। सब कुछ १० साल के लिखित डेटा और सटीक पैमाइश पर आधारित था।
2. भुगतान का तरीका
 * सल्तनत काल: कर अक्सर अनाज के रूप में लिया जाता था, जिसे ढोना और सुरक्षित रखना राज्य के लिए एक सिरदर्द था।
 * अकबर: अकबर ने नकदी (Cash) को प्राथमिकता दी। इससे साम्राज्य में सिक्कों का चलन बढ़ा और व्यापार में तेजी आई।
3. लचीलापन (Flexibility)
 * सल्तनत काल: कर की दरें अक्सर सुल्तान की युद्ध जरूरतों के हिसाब से बदलती रहती थीं।
 * अकबर: अकबर ने दरों को स्थिर कर दिया। किसान को पहले से पता होता था कि उसे कितना देना है, जिससे वह भविष्य की योजना बना सकता था।
ज़मींदारों की भूमिका और चुनौती
हालांकि अकबर ने सीधा संपर्क किसानों से करने की कोशिश की, लेकिन बीच में ज़मींदार भी थे। ये स्थानीय ताकतवर लोग थे जिनके पास अपनी सेनाएँ होती थीं। अकबर ने उन्हें पूरी तरह खत्म नहीं किया, बल्कि उन्हें प्रशासन का हिस्सा बना दिया। उन्हें कर वसूली में मदद के बदले 'नानकार' (भत्ता या कर-मुक्त भूमि) दी जाती थी।
यही वह संतुलन था जिसने अकबर के शासन को स्थिरता दी—एक तरफ वैज्ञानिक गणना और दूसरी तरफ स्थानीय प्रभाव का सम्मान।

मुगल वास्तुकला (Architecture) का स्वर्ण युग केवल कलाकारों की कल्पना पर नहीं, बल्कि ज़ब्ती प्रणाली की सटीकता पर टिका था। पंजाब, बंगाल और गुजरात के खेतों से आने वाले धन ने पत्थर को कविता में बदलने के लिए आवश्यक विशाल पूंजी प्रदान की।
यहाँ बताया गया है कि कैसे भू-राजस्व प्रणाली ने मुगलों की स्थापत्य विरासत की नींव रखी।
मिट्टी से बलुआ पत्थर तक: एक साम्राज्य का वित्तपोषण
जब अकबर के राजस्व सुधारों ने जड़ पकड़ ली, तो शाही खजाना (खज़ाना-ए-आमरा) लबालब भरने लगा। इतिहासकारों का अनुमान है कि अकबर का वार्षिक राजस्व लगभग 1.75 करोड़ पाउंड स्टर्लिंग था—16वीं शताब्दी के हिसाब से यह एक चौंका देने वाली राशि थी।
इसी अधिशेष (Surplus) धन ने अकबर को अपने पूर्वजों के उपयोगितावादी किलों से आगे बढ़कर एक नई सौंदर्यशास्त्र (Aesthetics) बनाने की अनुमति दी:
1. फतेहपुर सीकरी का निर्माण
राजस्व और कला के बीच का संबंध फतेहपुर सीकरी से बेहतर कहीं नहीं दिखता। लाल बलुआ पत्थर से बना यह शहर "पत्थर में लिखा गया एक राजनीतिक बयान" था।
 * लागत: महल परिसर, बुलंद दरवाजा और जामा मस्जिद के निर्माण के लिए हजारों कुशल मजदूरों, पत्थर तराशने वालों और हाथियों की जरूरत थी।
 * स्रोत: गंगा और यमुना के बीच की उपजाऊ भूमि (दोआब क्षेत्र) से प्राप्त राजस्व ने सीधे इन कारीगरों की मजदूरी का भुगतान किया।
2. मानकीकरण: शाही पैमाना
दिलचस्प बात यह है कि माप के प्रति जिस जुनून ने हमें तनाब (बांस की छड़ी) दी, उसी ने वास्तुकला को भी प्रभावित किया। अकबर ने 'गज़' (शाही यार्ड) को मानकीकृत किया।
 * जिस तरह जमीन को सटीकता के साथ मापा जाता था, उसी तरह हुमायूँ के मकबरे और आगरा के किले के द्वारों के आयामों की गणना इन मानकीकृत इकाइयों का उपयोग करके की गई थी, जिससे पूर्ण समरूपता (Symmetry) और गणितीय सद्भाव सुनिश्चित हुआ।
3. "नकद अर्थव्यवस्था" और कला
चूंकि अकबर ने कर नकद में देने पर जोर दिया था, इसलिए किसानों को अपनी अधिशेष फसल बाजारों में बेचनी पड़ती थी। इससे व्यापार में उछाल आया। इस व्यापार से उत्पन्न धन ने रईसों (मनसबदारों) को भी भव्य उद्यानों, मकबरों और मस्जिदों के निर्माण का मौका दिया, जिससे पूरे उपमहाद्वीप में "मुगल शैली" फैल गई।
एक तुलना: पैसा कहाँ गया?
| परियोजना | प्राथमिक कार्य | प्रतीकात्मक अर्थ |
|---|---|---|
| फतेहपुर सीकरी | शाही राजधानी | साम्राज्य की स्थिरता और धन। |
| हुमायूँ का मकबरा | वंशवादी स्मारक | मुगल वंश की वैधता। |
| आगरा का किला | सैन्य/आवासीय | राज्य की शक्ति और सुरक्षा। |
| नहरें और सराय | बुनियादी ढांचा | व्यापार को बढ़ावा देने के लिए राजस्व का पुनर्निवेश। |
व्यवस्था का सूर्यास्त
जैसे-जैसे साल बीतते गए, उसी धन ने जिसने ताजमहल (अकबर के पोते शाहजहाँ के काल में) के निर्माण में मदद की, व्यवस्था पर दबाव डालना शुरू कर दिया। बाद के सम्राटों ने और भी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं और अंतहीन युद्धों के लिए कर की मांग को 1/3 से बढ़ाकर 1/2 कर दिया।
जब जमीन जो दे सकती थी और राज्य जो ले रहा था, उसके बीच का संतुलन टूट गया, तो साम्राज्य बिखरने लगा। लेकिन अकबर के समय में, यह व्यवस्था एक आदर्श चक्र थी: मिट्टी ने खजाने को सींचा, खजाने ने कारीगरों का पेट भरा, और कारीगरों ने एक ऐसी विरासत खड़ी की जो आज भी गर्व से खड़ी है।

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