चेन्नई की शांत गलियों से शुरू हुआ एक सफर, जो राजनीति के शोर और सिनेमा की चकाचौंध से कहीं अधिक गहरा था, आज इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है। वह शख्स, जिसे दुनिया 'पावर स्टार' के नाम से जानती है—पवन कल्याण—जनवरी 2026 में केनजुत्सु (Kenjutsu) की प्राचीन जापानी समुराई मार्शल आर्ट कला में औपचारिक रूप से शामिल होने वाले पहले भारतीय बन गए हैं।
एक मौन योद्धा की राह
यह कहानी रातों-रात मिली सफलता की नहीं, बल्कि तीन दशकों की कठिन तपस्या की है। जब पूरा देश उनकी फिल्मों का दीवाना था, तब पवन कल्याण अंधेरे कमरों में अपनी आत्मा को तराश रहे थे। उन्होंने कराटे में ब्लैक बेल्ट के साथ शुरुआत की थी, लेकिन उनकी खोज उन्हें पूर्व की उन परंपराओं तक ले गई जहां युद्ध केवल एक कला नहीं, बल्कि एक दर्शन है।
भारत के प्रमुख बुडो विशेषज्ञों में से एक, हांशी प्रोफेसर डॉ. सिद्दीक महमूदी की देखरेख में, कल्याण ने कराटे के प्रहारों से आगे बढ़कर तलवारबाजी की घातक और सौम्य कला—केनजुत्सु—को अपनाया। उन्होंने केवल लड़ना नहीं सीखा, बल्कि 'योद्धा के मार्ग' (The Way of the Warrior) को जिया।
एक ऐतिहासिक सम्मान
साल 2026 की शुरुआत में उन्हें जो सम्मान मिले, वे आमतौर पर केवल जापानी योद्धाओं के लिए ही सुरक्षित रखे जाते हैं। उनके इस सम्मान ने भारत और जापान के बीच एक नया सांस्कृतिक सेतु बना दिया है:
* केनजुत्सु में प्रवेश: वह इस प्राचीन तलवारबाजी स्कूल में औपचारिक रूप से शामिल होने वाले पहले भारतीय बने।
* ताकेदा शिंगन कबीला (Takeda Shingen Clan): सोके मुरामात्सु सेंसेई के मार्गदर्शन में उन्हें ऐतिहासिक ताकेदा शिंगन कबीले में शामिल किया गया—एक ऐसा सम्मान जो जापान के बाहर बहुत कम लोगों को मिलता है।
* फिफ्थ डैन (Godan): मार्शल आर्ट्स की विश्व प्रसिद्ध संस्था 'सोगो बुडो कनरी काई' द्वारा उन्हें प्रतिष्ठित फिफ्थ डैन (5th Dan) से सम्मानित किया गया।
* टाइगर ऑफ मार्शल आर्ट्स: 'गोल्डन ड्रैगन्स' संगठन ने उन्हें इस उपाधि से नवाजा, जो उनके जीवन भर के समर्पण का प्रमाण है।
पर्दे से आत्मा तक का सफर
दशकों तक पवन कल्याण के प्रशंसकों ने पर्दे पर इस जुनून की झलक देखी—चाहे वह थमुडु (Thammudu) के स्टंट हों या 2025 की फिल्म OG में तलवार चलाने का उनका अंदाज। लेकिन इस अंतरराष्ट्रीय मान्यता ने साबित कर दिया कि आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री के लिए मार्शल आर्ट्स कभी महज एक अभिनय नहीं था।
यह एक ऐसी यात्रा थी जिसने बापटला के एक लड़के को जापानी कुलीन वर्ग के अनुशासन से जोड़ दिया। उनकी यह उपलब्धि हमें याद दिलाती है कि सच्ची महारत सीमाओं को नहीं जानती और समुराई की भावना उस हर व्यक्ति में जीवित है जिसके पास उसे पाने का अनुशासन है।