यह कहानी साहस, व्यापारिक लालसा, धार्मिक कट्टरता और उन समुद्री जहाजों की है जिन्होंने केप ऑफ गुड होप के रास्ते पूर्व के द्वार खोल दिए।
15वीं शताब्दी में यूरोप में मसालों (काली मिर्च, दालचीनी, लौंग) की भारी मांग थी। ये मसाले केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि मांस को लंबे समय तक सुरक्षित रखने और दवाओं के लिए अनिवार्य थे। उस समय व्यापारिक मार्ग 'सिल्क रोड' और वेनिस के व्यापारियों के माध्यम से अरबों के नियंत्रण में थे। ऑटोमन साम्राज्य के उदय ने पुराने व्यापारिक मार्गों को महंगा और खतरनाक बना दिया था।
पुर्तगाल के प्रिंस हेनरी 'द नेविगेटर' ने समुद्री अन्वेषण को राज्य की प्राथमिकता बनाया। उनका सपना था:
मुस्लिम व्यापारियों के एकाधिकार को तोड़ना।
सीधे भारत तक समुद्री रास्ता खोजना।
ईसाई धर्म का प्रचार करना और पौराणिक 'प्रेस्टर जॉन' (एक काल्पनिक ईसाई राजा) को ढूंढना।
8 जुलाई, 1497 को वास्को द गामा चार जहाजों के साथ लिस्बन से रवाना हुआ। महीनों के संघर्ष और दक्षिण अफ्रीका के चक्कर काटने के बाद, वह हिंद महासागर में प्रवेश कर गया। एक गुजराती नाविक (कहा जाता है कि उसका नाम कांजी मालम था) की मदद से, वह 20 मई, 1498 को केरल के कालीकट (कोझिकोड) के तट पर उतरा।
वहां के स्थानीय शासक, ज़मोरिन (Samudiri) ने उनका स्वागत तो किया, लेकिन पुर्तगालियों के पास भेंट में देने के लिए कोई मूल्यवान वस्तु नहीं थी। अरब व्यापारियों ने भी पुर्तगालियों का कड़ा विरोध किया। हालांकि वास्को द गामा को बहुत कम रियायतें मिलीं, लेकिन जब वह वापस लौटा, तो उसके जहाजों में भरे मसालों की कीमत यात्रा की लागत से 60 गुना अधिक थी। इस मुनाफे ने यूरोप में तहलका मचा दिया।
पुर्तगाली राजा मैनुअल प्रथम ने समझ लिया था कि केवल व्यापारिक यात्राओं से काम नहीं चलेगा; भारत में एक स्थायी शक्ति संरचना की आवश्यकता है। 1505 में, फ्रांसिस्को डी अल्मेडा को भारत का पहला वायसराय नियुक्त किया गया।
उसने 'ब्लू वॉटर पॉलिसी' (Cartaz system) की शुरुआत की। उसका मानना था कि जब तक पुर्तगाल समुद्र का स्वामी रहेगा, उसे जमीन पर किले बनाने की जरूरत नहीं होगी। उसने दीव की लड़ाई (1509) में मिस्र, गुजरात और तुर्की के संयुक्त बेड़े को हराकर हिंद महासागर पर पुर्तगाली वर्चस्व स्थापित कर दिया।
यदि अल्मेडा ने नींव रखी, तो अल्फोंसो डी अल्बुकर्क (1509-1515) ने उस पर इमारत खड़ी की। उसकी रणनीति स्पष्ट थी: रणनीतिक ठिकानों पर कब्जा करना।
गोवा की विजय (1510): अल्बुकर्क ने बीजापुर के सुल्तान से गोवा छीन लिया। गोवा पुर्तगाली भारत की राजधानी बना और 1961 तक उनके पास रहा।
रणनीतिक नियंत्रण: उसने मलक्का (मलेशिया) और होर्मुज (फारस की खाड़ी) पर कब्जा किया, जिससे हिंद महासागर के प्रवेश द्वारों पर पुर्तगालियों का ताला लग गया।
मिश्रित विवाह नीति: उसने पुर्तगाली पुरुषों को भारतीय महिलाओं से विवाह करने के लिए प्रोत्साहित किया ताकि एक वफादार पुर्तगाली-भारतीय आबादी तैयार हो सके।
सती प्रथा पर रोक: उसने अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में सती प्रथा को प्रतिबंधित किया, जो उस समय के लिए एक क्रांतिकारी कदम था।
'एस्तादो द इंडिया' का मुख्यालय पहले कोचीन था, जिसे बाद में 1530 में गोवा स्थानांतरित कर दिया गया। इनका प्रशासन अत्यंत केंद्रीकृत था:
वायसराय/गवर्नर: राजा का प्रतिनिधि, जिसके पास असीमित शक्तियां थीं।
काउंसिल: सलाह देने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की एक समिति।
फेतोरिया (Factories): ये केवल कारखाने नहीं, बल्कि किलेबंद व्यापारिक चौकियां थीं।
समाज और धर्म:
पुर्तगालियों का एक मुख्य उद्देश्य ईसाई धर्म का प्रचार था। 1540 के दशक में 'गोवा इन्क्विजिशन' (Goa Inquisition) शुरू हुआ, जो इतिहास का एक काला अध्याय माना जाता है। गैर-ईसाइयों पर अत्याचार किए गए और मंदिरों को नष्ट किया गया। प्रसिद्ध मिशनरी सेंट फ्रांसिस जेवियर इसी काल में भारत आए थे।
पुर्तगाली केवल युद्ध और धर्म ही नहीं लाए, बल्कि उन्होंने भारतीय जीवन शैली और कृषि में अमूल्य योगदान दिया:
फसलें: आलू, टमाटर, मक्का, पपीता, अनानास, अमरूद, और सबसे महत्वपूर्ण—लाल मिर्च और तंबाकू पुर्तगाली ही भारत लाए थे।
प्रिंटिंग प्रेस: 1556 में भारत की पहली प्रिंटिंग प्रेस गोवा में स्थापित की गई। पहली मुद्रित पुस्तक भी गोवा में ही निकली।
स्थापत्य कला: उन्होंने 'मैनुअलिन' शैली और बारोक शैली का मिश्रण कर 'इंडो-पोर्तुगीज' वास्तुकला को जन्म दिया, जिसके उदाहरण आज भी गोवा के चर्चों में देखे जा सकते हैं।
जहाज निर्माण: उन्होंने भारतीय सागौन की लकड़ी का उपयोग कर बेहतर जहाज बनाने की तकनीक विकसित की।
16वीं सदी के अंत तक पुर्तगाली शक्ति क्षीण होने लगी। इसके कई कारण थे:
अन्य यूरोपीय शक्तियों का उदय: डच और अंग्रेजों के पास बेहतर जहाज और अधिक पूंजी थी। उन्होंने पुर्तगाली एकाधिकार को चुनौती दी।
भ्रष्टाचार: पुर्तगाली अधिकारी व्यापार में निजी लाभ को प्राथमिकता देने लगे।
धार्मिक असहिष्णुता: उनकी जबरन धर्मांतरण की नीति ने स्थानीय शासकों और जनता को उनका दुश्मन बना दिया।
ब्राजील की खोज: पुर्तगाल का ध्यान भारत से हटकर ब्राजील के औपनिवेशीकरण की ओर चला गया, जो उनके लिए अधिक लाभदायक साबित हुआ।
स्पेन के साथ विलय: 1580 में पुर्तगाल स्पेन के अधीन हो गया, जिससे इसकी स्वायत्तता प्रभावित हुई।
जब 1947 में भारत आजाद हुआ, तो अंग्रेजों ने देश छोड़ दिया, लेकिन पुर्तगालियों ने गोवा, दमन और दीव को छोड़ने से इनकार कर दिया। उनका तर्क था कि ये 'कॉलोनी' नहीं बल्कि पुर्तगाल के 'विदेशी प्रांत' हैं।
भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वर्षों तक कूटनीतिक प्रयास किए, लेकिन पुर्तगाली तानाशाह एंटोनियो सालाज़ार अडिग रहे। अंततः, दिसंबर 1961 में भारत सरकार ने 'ऑपरेशन विजय' शुरू किया। मात्र 36 घंटों के भीतर, पुर्तगाली सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया और 451 वर्षों का पुर्तगाली शासन समाप्त हो गया।
पुर्तगालियों का भारत आगमन वैश्विक इतिहास की एक युगांतकारी घटना थी। उन्होंने न केवल यूरोप के लिए भारत के द्वार खोले, बल्कि आधुनिक नौसैनिक युद्ध कला और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नए आयाम स्थापित किए। हालांकि उनके शासन काल में धार्मिक कट्टरता और शोषण के दाग भी हैं, लेकिन उनके द्वारा लाए गए भाषाई, सांस्कृतिक और कृषि संबंधी बदलाव आज भी भारतीय समाज का हिस्सा हैं। 'एस्तादो द इंडिया' इतिहास का वह कोना है जहां पूर्व और पश्चिम का पहला और सबसे लंबा टकराव और मिलन हुआ।