गोविंदगढ़ किले की कहानी: पंजाब के इतिहास का एक गढ़
अमृतसर के मध्य में 43 एकड़ में फैला गोविंदगढ़ किला महज़ एक ढाँचा नहीं है; यह पंजाब के लचीलेपन, रणनीतिक महत्व और सिख साम्राज्य के स्वर्णिम युग का एक गहरा प्रतीक है। 250 से अधिक वर्षों के इतिहास के साथ, इस किले ने एक मिट्टी के दुर्ग, एक शाही खजाने, एक ब्रिटिश छावनी, और एक आधुनिक सैन्य अड्डे के रूप में सेवा की है, और अंततः एक प्रसिद्ध विरासत स्थल के रूप में जनता के लिए खोल दिया गया है।
उत्पत्ति: भंगियां दा किला (18वीं शताब्दी का मध्य)
किले की कहानी 18वीं शताब्दी के पंजाब क्षेत्र के खंडित राजनीतिक परिदृश्य से शुरू होती है, जब यह मिस्ल (सिख संप्रभु राज्य) के रूप में जाने जाने वाले कई सिख राज्यों के बीच विभाजित था।
* निर्माता और नाम: मूल संरचना एक साधारण मिट्टी का किला था, जिसका निर्माण 1760 के दशक में शक्तिशाली भंगी मिस्ल के सरदार और मुखिया गुज्जर सिंह भंगी ने करवाया था। इसके संस्थापकों के कारण, इसे मूल रूप से "भंगियां दा किला" (भंगियों का किला) के नाम से जाना जाता था।
* उद्देश्य: प्रारंभिक किले का निर्माण भंगी मिस्ल के क्षेत्र पर नियंत्रण सुनिश्चित करने और अमृतसर शहर की रक्षा के लिए किया गया था, जो व्यापार और तीर्थयात्रा का एक महत्वपूर्ण केंद्र था।
* ज़मज़मा तोप: किले का किंवदंतियों से जुड़ाव विशाल ज़मज़मा तोप ("भंगियां दी तोप") के अधिग्रहण के साथ शुरू हुआ। 14.3 फुट लंबी यह तोप एक मूल्यवान संपत्ति थी, जिसने भंगी शासन के दौरान किले के सैन्य महत्व और प्रतिष्ठा को बढ़ाया, जो लगभग 49 वर्षों तक चला।
स्वर्णिम युग: महाराजा रणजीत सिंह का परिवर्तन (1805–1839)
सिख साम्राज्य (खालसा राज) के संस्थापक महाराजा रणजीत सिंह के उदय के साथ किले का भाग्य नाटकीय रूप से बदल गया।
* विजय और नामकरण (1805): 1800 के दशक की शुरुआत में, किले पर नियंत्रण रणजीत सिंह की पंजाब को एकजुट करने की महत्वाकांक्षा के लिए महत्वपूर्ण हो गया। महान ज़मज़मा तोप को लेकर हुआ विवाद घेराबंदी का बहाना बन गया। भंगी शासकों (गुरदित सिंह भंगी और उनकी माता, माई सुखन) से किले पर कब्ज़ा करने के बाद, महाराजा रणजीत सिंह ने तुरंत इसका नाम दसवें सिख गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी के सम्मान में "गोविंदगढ़ किला" रख दिया।
* "पंजाब के शेर" का गढ़: रणजीत सिंह ने किले के रणनीतिक महत्व को समझा। यह शहर की दीवारों के बाहर स्थित था, लेकिन पूजनीय हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) की रक्षा करता था। उन्होंने मिट्टी के दुर्ग को ईंट और चूने से बने एक अभेद्य सैन्य गढ़ में बदल दिया।
* वास्तुशिल्प सुधार (1805–1809): अपने राज्यपाल और विदेश मंत्री, फ़कीर अज़ीज़ुद्दीन की देखरेख में, पर्याप्त विस्तार और किलेबंदी के प्रयास किए गए। महाराजा की सेवा में फ्रांसीसी और अन्य यूरोपीय जनरलों की सहायता से किले को मजबूत दीवारों, चार सु-विकसित बुर्जों (bastions), एक गहरी खाई और फ्रांसीसी सैन्य वास्तुकला से प्रभावित एक जटिल लेआउट के साथ सुदृढ़ किया गया।
* शाही ख़ज़ाना: गोविंदगढ़ किला सिख साम्राज्य की अपार दौलत का सुरक्षित भंडार बन गया। किले के तोशखाना (खजाने) में विश्व प्रसिद्ध कोह-ए-नूर हीरा, साथ ही बड़ी मात्रा में सोना, चांदी और कीमती जवाहरात रखे गए थे, जिसने सिख साम्राज्य के आर्थिक और सैन्य हृदय के रूप में इसकी स्थिति को मजबूत किया।
* शक्ति का केंद्र: किले ने एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक, सैन्य और टकसाल केंद्र के रूप में कार्य किया। यहाँ "ज़रब श्री अमृतसर" शिलालेख वाले चांदी के रुपये ढाले जाते थे। 1837 में, किले में महाराजा रणजीत सिंह के पोते, प्रिंस नौनिहाल सिंह की भव्य शादी का आयोजन किया गया था, जिसने एक शाही निवास के रूप में इसकी भूमिका को रेखांकित किया।
ब्रिटिश कब्ज़ा (1849–1947)
महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु और उसके बाद सिख साम्राज्य के पतन के बाद, किले का नियंत्रण अंग्रेजों के हाथों में चला गया।
* एंग्लो-सिख युद्ध के बाद कब्ज़ा: द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध के बाद 1849 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने किले पर कब्ज़ा कर लिया, जिसने खालसा राज के अंतिम पतन को चिह्नित किया।
* छावनी में परिवर्तन: अंग्रेजों ने किले के स्थायी रणनीतिक मूल्य को पहचाना और इसे एक सैन्य छावनी में बदल दिया। उन्होंने दरबार हॉल और 'एंग्लो सिख बंगला' के निर्माण, और यहां तक कि एक 50 मीटर ऊंचे पहरेदार टॉवर (जिसे बाद में ध्वस्त कर दिया गया) सहित कई रक्षात्मक और संरचनात्मक सुधार किए।
* फांसी घर: ब्रिटिश राज के दौरान, किले का उपयोग जेल के रूप में भी किया जाता था, और इसमें कुख्यात 'फांसी घर' या फांसी टॉवर मौजूद है, जो औपनिवेशिक काल की न्याय प्रणाली की एक गंभीर याद दिलाता है।
* सैन्य गोपनीयता: पूरे ब्रिटिश शासन और बाद के दशकों के दौरान, किला एक सक्रिय सैन्य सुरक्षित क्षेत्र बना रहा, आम जनता के लिए पूरी तरह दुर्गम।
स्वतंत्रता के बाद और जीर्णोद्धार (1947–वर्तमान)
भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद, किला 1947 में भारतीय सेना के हाथों में चला गया, जिसने दशकों तक इसका उपयोग एक सैन्य अड्डे के रूप में जारी रखा।
* हस्तांतरण और जीर्णोद्धार: किले को अंततः 2006 में पंजाब राज्य सरकार को सौंप दिया गया। सैन्य अड्डे को एक सांस्कृतिक विरासत स्थल में बदलने के लिए एक बड़े जीर्णोद्धार और संरक्षण परियोजना की शुरुआत की गई।
* जनता के लिए खोला गया (2017): गोविंदगढ़ किले को आधिकारिक तौर पर फरवरी 2017 में जनता के लिए खोला गया। इसे अब एक "जीवित संग्रहालय" और थीम पार्क के रूप में प्रबंधित किया जाता है, जो पंजाब के इतिहास और संस्कृति को संरक्षित करने और प्रदर्शित करने के लिए समर्पित है।
* वर्तमान आकर्षण और महत्व: आज, किले के परिसर में कई संग्रहालय और प्रदर्शनियाँ शामिल हैं:
* तोशखाना: अब एक संग्रहालय है जो किले के खजानों, जिसमें कोह-ए-नूर हीरे की प्रतिकृति भी शामिल है, को प्रदर्शित करता है।
* युद्ध कला संग्रहालय (The Warfare Museum): हथियार, कवच, और ज़मज़मा तोप की प्रतिकृति प्रदर्शित करता है।
* शेर-ए-पंजाब: महाराजा रणजीत सिंह के जीवन और समय का विवरण देने वाला एक लोकप्रिय 7D शो।
* स्थायी विरासत: गोविंदगढ़ किला अब एक गतिशील पर्यटन और शैक्षिक गंतव्य के रूप में कार्य करता है, जो आधुनिक पंजाब और उसके शानदार, अशांत, और ऐतिहासिक अतीत के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी प्रदान करता है, स्वर्ण मंदिर और अमृतसर शहर के इतिहास की रक्षा करने वाले एक स्थायी प्रहरी के रूप में खड़ा है।