हम्पी की पूरी कहानी: किष्किंधा से खंडहरों के शहर तक
हम्पी, या हम्पी के स्मारकों का समूह (Group of Monuments at Hampi), कर्नाटक राज्य में शानदार खंडहरों के एक संग्रह से कहीं अधिक है। यह इतिहास का एक अतिव्यापी पटल है, जहाँ पौराणिक कथाओं, शाही भव्यता, विनाशकारी युद्ध, और शांत पुनर्जागरण की परतें तुंगभद्रा नदी के किनारे पत्थरों से भरे परिदृश्य पर अंकित हैं। "हम्पी" नाम स्वयं "पम्पा" का स्थानीय अंग्रेजीकृत संस्करण है, जो तुंगभद्रा नदी का प्राचीन नाम है, और यह नाम बदले में हिंदू देवी पार्वती के एक रूप पम्पा देवी से लिया गया है।
I. ????️ आदिम और पौराणिक जड़ें (14वीं शताब्दी ईस्वी से पूर्व)
हम्पी का इतिहास उस साम्राज्य से कहीं ज़्यादा पुराना है जिसके लिए यह सबसे प्रसिद्ध है।
पवित्र परिदृश्य
हम्पी की अनूठी स्थलाकृति—प्राचीन ग्रेनाइट पहाड़ियों से घिरा एक विस्तृत मैदान और तुंगभद्रा नदी द्वारा विभाजित—इसे सहस्राब्दियों से एक पवित्र स्थल बनाए हुए है। पुरातात्विक साक्ष्य, जिनमें नवपाषाण (Neolithic) और ताम्रपाषाण (Chalcolithic) काल की कलाकृतियाँ शामिल हैं, यह दर्शाते हैं कि इस क्षेत्र में मानव निवास कम से कम ईसा पूर्व दूसरी और तीसरी शताब्दी से रहा है। यह क्षेत्र विभिन्न राजवंशों के प्रभाव में था, जिनमें मौर्य (जैसा कि अशोक के शिलालेखों से पता चलता है), चालुक्य, और होयसल शामिल हैं, जिन्होंने इस क्षेत्र के आध्यात्मिक महत्व को पहचाना।
किष्किंधा की कथा
शायद सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक कहानी हिंदू महाकाव्य रामायण से इसका जुड़ाव है। स्थानीय लोककथाएँ और भूगोल हम्पी क्षेत्र को वानरों (बंदरों) के पौराणिक राज्य किष्किंधा के रूप में दृढ़ता से पहचानते हैं।
* अंजनाद्रि पहाड़ी को भगवान राम के भक्त सेनापति हनुमान का जन्मस्थान माना जाता है।
* पास की ऋष्यमूक पहाड़ी का उल्लेख उस स्थान के रूप में किया गया है जहाँ वानर-राज सुग्रीव और बाली ने शरण ली थी।
* भगवान राम और लक्ष्मण का वानर सेना से मिलन, जिसका समापन सीता को बचाने की खोज में हुआ, इस क्षेत्र के प्राचीन आख्यान का केंद्रीय हिस्सा है, जो इसके शाही इतिहास से सदियों पुराना है।
पम्पा-विरूपाक्ष किंवदंती
इस स्थल का नाम देवी पम्पा से आंतरिक रूप से जुड़ा हुआ है, जो पार्वती का एक अवतार हैं। किंवदंती है कि पम्पा ने पास की हेमकूटा पहाड़ी पर भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर, शिव ने उनसे विवाह किया और पम्पापति के नाम से जाने गए। विरूपाक्ष मंदिर, जो आज हम्पी में सबसे पुराने और एकमात्र निरंतर कार्यरत मंदिर के रूप में खड़ा है, उनके विवाह का पवित्र स्थल माना जाता है और यह भविष्य की राजधानी का केंद्रबिंदु है। यह मंदिर परिसर कम से कम 7वीं शताब्दी ईस्वी से लगातार पूजा का स्थान रहा है।
II. ???? विजयनगर साम्राज्य का उदय (1336–1565 ईस्वी)
14वीं शताब्दी ने हम्पी के स्वर्ण युग की शुरुआत को चिह्नित किया, क्योंकि यह एक शक्तिशाली, उभरते हुए साम्राज्य की राजधानी बन गया।
स्थापना: हरिहर और बुक्का
विजयनगर साम्राज्य, या कर्नाटक साम्राज्य, का उदय उत्तरी दिशा से हुए राजनीतिक अस्थिरता और मुस्लिम आक्रमणों की सीधी प्रतिक्रिया थी, जिसने पिछले दक्षिण भारतीय राज्यों (यादव, काकतीय, होयसल और पांड्य) को तबाह कर दिया था।
1336 ईस्वी में, दो भाइयों, हरिहर प्रथम (हक्का) और बुक्का राय प्रथम ने, जो पहले काकतीय और कम्पिली प्रमुखों के अधीन सेनापति थे, एक नए राज्य की स्थापना की। पारंपरिक विवरण के अनुसार, उन्हें दक्कन के सल्तनतों के खिलाफ एक हिंदू गढ़ स्थापित करने के लिए ऋषि विद्यारण्य द्वारा प्रेरित और निर्देशित किया गया था। उन्होंने पवित्र पम्पा-क्षेत्र को, जो सुरक्षात्मक पहाड़ियों और नदी से घिरा हुआ था, अपनी राजधानी के रूप में चुना, जिसका नाम उन्होंने विजयनगर—"विजय का शहर"—रखा।
वे संगम राजवंश से संबंधित थे, जिसका नाम उनके पिता संगम के नाम पर रखा गया था।
राजवंश और सुदृढ़ीकरण
अगली दो शताब्दियों में, विजयनगर एक क्षेत्रीय राज्य से एक विशाल साम्राज्य में विकसित हुआ जिसने लगभग पूरे दक्षिण भारत पर प्रभुत्व जमाया। हम्पी, या विजयनगर शहर, इस विशाल राज्य का प्रशासनिक, आर्थिक और सांस्कृतिक केंद्र था।
| राजवंश | शासनकाल (लगभग) | प्रमुख शासक | महत्वपूर्ण योगदान |
|---|---|---|---|
| संगम | 1336 – 1485 ईस्वी | देव राय द्वितीय | साम्राज्य को मजबूत किया; महत्वपूर्ण प्रारंभिक मंदिर और किलेबंदी का कार्य। |
| सालुव | 1485 – 1505 ईस्वी | सालुव नरसिम्हा देव राय | आंतरिक कलह के बाद स्थिरता बहाल की; भविष्य के विस्तार की नींव रखी। |
| तुलुव | 1505 – 1567 ईस्वी | कृष्णदेव राय | साम्राज्य का स्वर्ण युग; अधिकतम क्षेत्रीय विस्तार; सबसे शानदार वास्तुकला कार्य। |
| अराविदु | 1567 – 1646 ईस्वी | तिरुमल देव राय | हम्पी के पतन के बाद राजधानी स्थानांतरित की; अंतिम गिरावट की निगरानी की। |
???? कृष्णदेव राय के अधीन स्वर्ण युग (1509–1529 ईस्वी)
तुलुव राजवंश के सम्राट कृष्णदेव राय के शासनकाल को साम्राज्य की शक्ति और संस्कृति का चरम माना जाता है। वह एक शानदार सेनापति, कला के विद्वान संरक्षक (विशेषकर तेलुगु साहित्य के), और एक विपुल निर्माता थे।
* धन और व्यापार: विदेशी यात्रियों, विशेष रूप से पुर्तगाली इतिहासकारों जैसे डोमिंगो पेस और फर्नाओ नुनिज़ ने विजयनगर को दुनिया के सबसे धनी और सबसे बड़े शहरों में से एक बताया, जो 1500 ईस्वी तक बीजिंग के बाद दूसरे स्थान पर था। इसके बाज़ार सोने, मसालों, रेशम, और यहाँ तक कि हीरे और माणिक जैसे कीमती रत्नों के व्यापार के लिए प्रसिद्ध थे, जिन्हें कथित तौर पर सार्वजनिक बाज़ारों में ढेर लगाकर बेचा जाता था।
* वास्तुकला और निर्माण: इस अवधि के दौरान शहर अपनी अंतिम वास्तुशिल्प भव्यता तक पहुँच गया। कृष्णदेव राय ने सबसे प्रतिष्ठित संरचनाओं का निर्माण या महत्वपूर्ण विस्तार किया, जिनमें शामिल हैं:
* विट्ठला मंदिर परिसर, जो द्रविड़ वास्तुकला की एक उत्कृष्ट कृति है, जिसमें प्रसिद्ध पत्थर का रथ और संगीत स्तंभ हैं।
* विरूपाक्ष मंदिर का विस्तार।
* हज़ार राम मंदिर (राजपरिवार का निजी मंदिर)।
* कई गोपुरम (स्मारक प्रवेश द्वार मीनारें), मंडप (स्तंभ वाले हॉल), और जल प्रणालियाँ।
राजधानी की संरचना
विजयनगर एक विशाल, किलेबंद शहर था, जो 40 वर्ग किलोमीटर से अधिक के क्षेत्र में सावधानीपूर्वक योजनाबद्ध किया गया था। इसे कार्यात्मक रूप से तीन मुख्य क्षेत्रों में विभाजित किया गया था:
* पवित्र केंद्र: तुंगभद्रा नदी के आसपास स्थित, इस क्षेत्र में विरूपाक्ष और विट्ठला जैसे प्रमुख मंदिर थे, जो साम्राज्य के आध्यात्मिक अधिकार को दर्शाते थे।
* शहरी केंद्र: आम जनता के लिए बाज़ार क्षेत्र, शिल्प क्वार्टर और आवासीय जिले।
* शाही केंद्र: किलेबंद गढ़ जिसमें शाही महल, प्रशासनिक भवन, टकसाल, सैन्य मुख्यालय (जैसे हाथी अस्तबल और राजा का दर्शक हॉल), और औपचारिक संरचनाएं (जैसे महानवमी डिब्बा और रानी का स्नानगृह) शामिल थे। यह अलगाव शहर नियोजन की एक प्रमुख विशेषता थी।
III. ???? पतन और परित्याग (1565 ईस्वी)
हम्पी की कहानी एक तीव्र और विनाशकारी अंत में समाप्त होती है, जिसमें शानदार राजधानी खंडहरों में सिमट गई।
तालिकोटा का युद्ध (1565 ईस्वी)
अपनी शक्ति के बावजूद, विजयनगर साम्राज्य लगातार पांच पड़ोसी मुस्लिम दक्कन सल्तनतों: बीदर, बीजापुर, अहमदनगर, गोलकोंडा और बरार के साथ संघर्ष में रहा।
जनवरी 1565 ईस्वी में, चार सल्तनतों (बरार ने भाग नहीं लिया) के गठबंधन ने तालिकोटा के युद्ध (राकस-तंगड़ी) में विजयनगर के रीजेंट आलिया राम राय की सेनाओं का सामना किया। जो एक रणनीतिक लड़ाई के रूप में शुरू हुआ, वह विजयनगर सेना के लिए तेजी से एक विनाशकारी हार में बदल गया। आलिया राम राय को पकड़ लिया गया और उन्हें फाँसी दे दी गई, जिससे साम्राज्य अराजकता में डूब गया।
विजयनगर की लूट
जीत के बाद, सल्तनत की सेनाएँ विजयनगर पर टूट पड़ीं। छह महीने की अवधि तक, शहर को व्यवस्थित रूप से लूटा गया, ध्वस्त किया गया और नष्ट कर दिया गया।
* लक्षित विनाश: आक्रमणकारियों ने शाही और पवित्र केंद्रों पर अपने विनाश को केंद्रित किया, जानबूझकर महलों को ढहाया, मंदिर की मूर्तियों को विरूपित किया, प्रशासनिक भवनों को जला दिया, और परिष्कृत जल-आपूर्ति प्रणालियों को नष्ट कर दिया।
* सामूहिक पलायन: शाही परिवार और कुलीन वर्ग दक्षिण की ओर भाग गए, अंततः राजधानी को पेनुकोंडा में स्थानांतरित कर दिया गया, लेकिन विजय के शहर की भव्यता हमेशा के लिए खो गई। आम जनता ने खंडहर हो चुकी राजधानी को छोड़ दिया।
एक समकालीन पर्यवेक्षक ने टिप्पणी की कि विनाश इतना पूर्ण था कि "कुत्तों को भी... खाने के लिए रोटी का एक टुकड़ा नहीं मिल सका।" भव्य विजय का शहर मलबे और टूटे पत्थर के एक "उदात्त, भव्य स्थल" के रूप में छोड़ दिया गया था।
IV. ⏳ गिरावट और पुनर्खोज की अवधि (1565 ईस्वी – आधुनिक युग)
अगली चार शताब्दियों तक, हम्पी काफी हद तक निर्जन रहा, जो इसकी पिछली महिमा का एक भयानक प्रमाण था।
साम्राज्य का अंत
हालांकि अराविदु राजवंश ने विभिन्न दक्षिणी राजधानियों से एक और शताब्दी तक विजयनगर साम्राज्य को जारी रखा, लेकिन इसकी शक्ति बहुत कम हो गई थी। कभी-प्रभुत्वशाली साम्राज्य अंततः छोटे नायक मुखियाओं (जैसे मैसूर, तंजावुर और केलडी) में विघटित हो गया, जिसने अपने केंद्रीय अधिकार को खो दिया। हालाँकि, हम्पी ने कभी भी अपनी राजनीतिक स्थिति वापस नहीं पाई।
जीवित मंदिर
निर्णायक रूप से, सब कुछ गायब नहीं हुआ। विरूपाक्ष मंदिर, अपनी अत्यधिक प्राचीनता और निरंतर धार्मिक महत्व के कारण, पूजा का एक सक्रिय स्थान बना रहा। इस निरंतर कार्य ने मंदिर को क्षय और परित्याग के उस अंतिम स्तर से बचाने में मदद की जो शहर के बाकी हिस्सों पर पड़ा था। हम्पी स्थानीय लोगों की भक्ति से पोषित, एक क्षेत्रीय तीर्थस्थल के रूप में बना रहा।
यूरोपीय और पुरातात्विक रुचि
हम्पी के व्यापक खंडहरों ने शुरुआती ब्रिटिश प्रशासकों और पुरातत्वविदों का ध्यान आकर्षित किया।
* पहले व्यापक सर्वेक्षण 18वीं शताब्दी के अंत में कर्नल कॉलिन मैकेंज़ी जैसे ब्रिटिश इंजीनियरों द्वारा किए गए थे।
* ये खंडहर दक्षिण भारत के इतिहास, वास्तुकला और राजनीतिक प्रणालियों के अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल बन गए, धीरे-धीरे शिलालेखों, विदेशी वृत्तांतों और भौतिक अवशेषों से खोए हुए साम्राज्य की कहानी को एक साथ जोड़ा गया।
1986 में, हम्पी के स्मारकों के समूह को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया, जिससे संरक्षण और पुरातात्विक अनुसंधान के लिए वैश्विक मान्यता और महत्वपूर्ण धन प्राप्त हुआ। यह साइट के आधुनिक-युग की "पुनर्खोज" और संरक्षण की शुरुआत थी।
V. ????️ वास्तुकला और सांस्कृतिक विरासत
हम्पी का स्थायी महत्व इसकी कला और वास्तुकला की समृद्ध विरासत में निहित है, जिसे सामूहिक रूप से विजयनगर शैली के रूप में जाना जाता है।
प्रमुख वास्तुशिल्प विशेषताएँ
यह शैली हिंदू मंदिर परंपराओं (द्रविड़) और अद्वितीय शाही अलंकरणों के मिश्रण के लिए जानी जाती है:
* कल्याण मंडप: विशाल, अलंकृत विवाह हॉल जिनमें अविश्वसनीय रूप से विस्तृत, गढ़ी हुई स्तंभ होते हैं, जिनमें अक्सर बढ़ते हुए याली (पौराणिक सिंह जैसे जीव) होते हैं।
* स्तंभ वाले गलियारे: मुख्य मंदिर के चारों ओर सैकड़ों गढ़े हुए स्तंभों के साथ विशाल प्रदक्षिणा-पथ (परिक्रमा मार्ग)।
* दरबारी-धार्मिक संरचनाएँ: शाही और पवित्र परिसरों के भीतर धर्मनिरपेक्ष वास्तुकला (जैसे लोटस महल और हाथी अस्तबल) का एकीकरण, एक अद्वितीय संश्लेषण का प्रदर्शन।
* एकाश्म मूर्तियां: विशाल एकल-पत्थर की मूर्तियाँ, जैसे उग्र नरसिंह और बड़वलिंग (शिव लिंग)।
* इंजीनियरिंग चमत्कार: परिष्कृत जल-प्रणालियों और सिंचाई नहरों (जैसे जलग्रीस) और विशाल किलेबंदी का निर्माण जो साम्राज्य के उन्नत इंजीनियरिंग को प्रमाणित करता है।
प्रमुख जीवित स्मारक
आज खंडहर 4,100 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैले हुए हैं, जिनमें 1,600 से अधिक जीवित अवशेष हैं, जिनमें से प्रत्येक कहानी का एक टुकड़ा बताता है।
| स्थल | महत्व |
|---|---|
| विरूपाक्ष मंदिर | सबसे पुराना और लगातार कार्यरत मंदिर; भगवान शिव को समर्पित; इसका गोपुरम पवित्र केंद्र पर हावी है। |
| विट्ठला मंदिर परिसर | विजयनगर कला की अंतिम अभिव्यक्ति; पत्थर के रथ और रंग मंडप के संगीत स्तंभों के लिए प्रसिद्ध। |
| हज़ार राम मंदिर | निजी शाही मंदिर, जिसमें रामायण के दृश्यों को दर्शाते हजारों गढ़े हुए पैनल हैं। |
| महानवमी डिब्बा | नवरात्रि उत्सव के दौरान शाही समारोहों और सैन्य परेडों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक विशाल पत्थर का मंच। |
| लोटस महल | एक सुंदर, संलयन-शैली की संरचना जो शाही महिलाओं के लिए एक मनोरंजक महल के रूप में कार्य करती थी। |
| रानी का स्नानगृह | एक विस्तृत, इनडोर शाही स्नान संरचना जिसमें मेहराबदार गलियारे और जटिल प्लास्टर का काम है, जो इंडो-सारासेनिक तत्वों का मिश्रण है। |
निष्कर्ष: आज के खंडहरों का शहर
हम्पी एक गहन प्रतीक के रूप में खड़ा है - न केवल एक खोए हुए हिंदू साम्राज्य और उसकी गौरवशाली कलात्मक उपलब्धियों का, बल्कि इतिहास की चक्रीय प्रकृति का भी। यह गहन आध्यात्मिक महत्व का स्थान था, एक बेजोड़ वैश्विक वाणिज्यिक केंद्र, और एक सैन्य रूप से प्रभावशाली शक्ति की राजधानी थी। इसका विनाश तो पूर्ण था, लेकिन इसके निर्माताओं के पैमाने और महत्वाकांक्षा यह सुनिश्चित करते हैं कि खंडहरों में भी यह एक विस्मयकारी स्थल बना रहे।
आज, हम्पी पर्यटन और तीर्थयात्रा का एक जीवंत केंद्र है, जो लाखों लोगों को आकर्षित करता है जो इसके पथरीले रास्तों पर घूमते हैं, एक बार दुनिया के दूसरे सबसे बड़े शहर के रूप में जाने जाने वाले महान शहर की गूँज सुनने की कोशिश करते हैं। यह दीवारों के बिना एक शानदार संग्रहालय है, जो भारत के सबसे शानदार ऐतिहासिक कालखंडों में से एक में लगातार नई अंतर्दृष्टि प्रकट करता है।