पुस्तक का शीर्षक: तर्क की स्याही (The Red Ink of Reason)
अध्याय 1: आस्था के बीज
कहानी एक युवा भगत सिंह से शुरू होती है, जिनका पालन-पोषण एक गहरे धार्मिक सिख परिवार में हुआ था। वे अपने बचपन को एक "कट्टर आस्तिक" के रूप में वर्णित करते हैं। वे घंटों प्रार्थना करते थे, अनुष्ठानों का पालन करते थे और उनका मानना था कि एक दिव्य शक्ति भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का मार्गदर्शन कर रही है। वे हमेशा अपने पास एक छोटी प्रार्थना पुस्तिका रखते थे और मानते थे कि ईश्वर ही न्याय का अंतिम निर्णायक है।
अध्याय 2: क्रांति की अग्नि
जैसे-जैसे सिंह क्रांतिकारी दुनिया में कदम रखते हैं, उनका ध्यान कर्मकांड से हटकर वास्तविकता की ओर जाने लगता है। वे भारत की कुचलने वाली गरीबी और ब्रिटिश राज की क्रूरता को देखते हैं। वे सवाल पूछना शुरू करते हैं: "यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान और अत्यंत दयालु है, तो वह 300 मिलियन लोगों को गुलाम और भूखा रहने की अनुमति क्यों देता है?"
अध्याय 3: जेल की कोठरी में पुस्तकालय
केंद्रीय विधानसभा में बम फेंकने के बाद, सिंह को कैद कर लिया जाता है। यह पुस्तक का "मुख्य हिस्सा" है। अपनी कोठरी में, वे मार्क्स, बाकुनिन, लेनिन और डार्विन को बहुत गहराई से पढ़ते हैं।
* संघर्ष: उनके साथी कैदी, बाबा रणधीर सिंह (जो एक धार्मिक व्यक्ति थे), भगत से कहते हैं कि उनकी नास्तिकता उनके अहंकार (Vanity) से पैदा हुई है।
* प्रतिक्रिया: भगत अपनी रातें यह साबित करने के लिए लिखने में बिताते हैं कि उनका विश्वास की कमी अहंकार नहीं, बल्कि तर्क (Reason) का परिणाम है।
अध्याय 4: बुराई का सवाल
इस महत्वपूर्ण खंड में, सिंह एक "सृष्टिकर्ता" के विचार का खंडन करते हैं। वे "कर्म" के सिद्धांत को चुनौती देने के लिए तर्क का उपयोग करते हैं।
* वे पूछते हैं कि एक बच्चा अंधा या झुग्गी-झोपड़ी में क्यों पैदा होता है?
* यदि यह पिछले जन्म की सजा है, तो बच्चे को अपना अपराध याद क्यों नहीं है?
* वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि "ईश्वर" एक "मिथक" है जिसे मनुष्यों ने कमजोरों को साहस देने और शक्तिशाली लोगों के शोषण को सही ठहराने के लिए बनाया है।
अध्याय 5: अंतिम पड़ाव
जैसे-जैसे उनकी फांसी की तारीख करीब आती है, उनके संकल्प की परीक्षा होती है। अधिकांश लोग मौत का सामना करते समय ईश्वर की ओर मुड़ जाते हैं। सिंह इसके विपरीत करते हैं। वे तर्क देते हैं कि जो व्यक्ति परलोक (afterlife) के "नशे" के बिना फांसी के फंदे पर खड़ा हो सकता है, वही वास्तव में स्वतंत्र है।
> "जो व्यक्ति प्रगति के लिए खड़ा है, उसे पुराने विश्वास के हर पहलू की आलोचना करनी होगी। उसे प्रचलित धारणा की हर सीमा को चुनौती देनी होगी।" — भगत सिंह
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कहानी के प्रमुख वैचारिक स्तंभ
यदि आप इसे एक पूर्ण जीवनी के रूप में लिख रहे हैं, तो आप इन तीन तार्किक बदलावों पर ध्यान केंद्रित करेंगे:
| चरण | विश्वास प्रणाली | प्रेरक शक्ति |
|---|---|---|
| बचपन | धार्मिक सिख धर्म | परंपरा और परिवार |
| प्रारंभिक क्रांति | रहस्यवाद/आदर्शवाद | युद्ध में "दैवीय समर्थन" की आवश्यकता |
| जेल का समय | भौतिकवाद/नास्तिकता | तर्क, विज्ञान और सामाजिक न्याय |
चरमोत्कर्ष (The Climax): फांसी का फंदा
पुस्तक का अंत 23 मार्च, 1931 को होगा। जहाँ दूसरे लोग प्रार्थना कर रहे हैं, वहीं सिंह क्लारा ज़ेटकिन या लेनिन की पुस्तक पढ़ रहे हैं। वे अपने होठों पर प्रार्थना लेकर नहीं, बल्कि मानवीय अवज्ञा का नारा लेकर फांसी के फंदे पर झूल जाते हैं। वे साबित करते हैं कि उनके "अविश्वास" ने उन्हें उनके दमनकारियों के "विश्वास" से कहीं अधिक शक्ति दी।
यह कहानी आज क्यों मायने रखती है?
भगत सिंह की नास्तिकता अद्वितीय थी क्योंकि वह मानवतावादी थी। उन्होंने केवल ईश्वर में विश्वास करना बंद नहीं किया; उन्होंने मानवता में विश्वास करना शुरू कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि यदि हमें बचाने के लिए कोई ईश्वर नहीं है, तो हमें एक-दूसरे को बचाना होगा।
यह दृश्य उस ऐतिहासिक बहस पर आधारित है जो लाहौर सेंट्रल जेल में भगत सिंह और बाबा रणधीर सिंह (एक क्रांतिकारी और धार्मिक व्यक्ति) के बीच हुई थी। इसी बहस ने भगत सिंह को अपना प्रसिद्ध निबंध लिखने के लिए प्रेरित किया था।
दृश्य: कालकोठरी का संवाद
स्थान: लाहौर सेंट्रल जेल, संकरी अंधेरी कोठरी।
समय: रात का गहरा पहर, 1930।
पात्र: * भगत सिंह: उम्र 23 वर्ष, आँखों में तेज और हाथ में एक किताब।
* बाबा रणधीर सिंह: उम्रदराज, सफेद दाढ़ी, चेहरे पर आध्यात्मिक शांति।
(कोठरी की सलाखों के पीछे भगत सिंह मोमबत्ती की मद्धम रोशनी में 'मार्क्स' की किताब पढ़ रहे हैं। जंजीरों की खनक सुनाई देती है क्योंकि बाबा रणधीर सिंह उनकी कोठरी के पास आकर रुकते हैं।)
बाबा रणधीर सिंह: (दुखी स्वर में) "भगत, सुना है तुमने सुबह का सिमरण (प्रार्थना) करना छोड़ दिया है? फांसी का फंदा सामने खड़ा है, और तुम उस परमात्मा को भूल रहे हो जिसने तुम्हें यह जीवन दिया?"
भगत सिंह: (किताब से नज़रें हटाकर, धीमे से मुस्कुराते हुए) "बाबा, जिस परमात्मा की आप बात कर रहे हैं, उसे मैंने अपनी कोठरी के दरवाज़े पर बहुत ढूंढा। पर वहाँ सिर्फ भूख, चीखें और ब्रिटिश हुकूमत के कोड़े मिले। मुझे वहाँ कोई भगवान नहीं दिखा।"
बाबा रणधीर सिंह: (आवेश में) "यह तुम्हारी बुद्धि का दोष नहीं, यह तुम्हारा अहंकार है! तुम मशहूर हो गए हो, पूरी दुनिया तुम्हारा नाम ले रही है, इसलिए तुम इतने अभिमानी हो गए हो कि उस रचयिता को ही नकार रहे हो। यह तुम्हारी प्रसिद्धि का नशा है, भगत!"
भगत सिंह: (शांत रहकर खड़े होते हैं और सलाखों के पास आते हैं) "अहंकार, बाबा? अगर मैं आज झुक जाऊं और खुदा से अपनी जान की भीख माँग लूँ, तो मेरा बोझ हल्का हो जाएगा। आस्तिकता तो इंसान के लिए एक सहारा है, एक 'नशा' है जो उसे दुख सहने की ताकत देता है। लेकिन मैं बिना उस सहारे के, अकेले अपने पैरों पर खड़ा होकर इस मौत का सामना करना चाहता हूँ। क्या अपनी आँखों से सच देखना अहंकार है?"
बाबा रणधीर सिंह: "सच? सच तो वह है जो शास्त्रों में लिखा है। बिना उसकी मर्जी के एक पत्ता नहीं हिलता। तुम इस लड़ाई में अकेले पड़ जाओगे।"
भगत सिंह: "अगर एक पत्ता भी उसकी मर्जी के बिना नहीं हिलता, तो बाबा, क्या यह गुलामी भी उसकी मर्जी है? क्या जलियांवाला बाग में निर्दोषों का कत्लेआम उसकी मर्जी थी? क्या उन गरीब बच्चों का भूखा मरना भी उसी का खेल है? अगर वह यह सब देख रहा है और चुप है, तो वह 'दयालु' नहीं हो सकता। और अगर वह इसे रोक नहीं सकता, तो वह 'सर्वशक्तिमान' नहीं है।"
(बाबा रणधीर सिंह निरुत्तर होकर उन्हें देखते रह जाते हैं।)
भगत सिंह: "मैंने ईश्वर को इसलिए नहीं छोड़ा कि मुझे खुद पर घमंड है। मैंने उसे इसलिए छोड़ा ताकि मैं इंसानियत पर भरोसा कर सकूँ। मैं अपनी मौत के बाद किसी जन्नत या स्वर्ग की लालच में नहीं मर रहा। मैं मर रहा हूँ ताकि आने वाली नस्लें आज़ाद हवा में सांस ले सकें। मेरा कोई पुरस्कार नहीं होगा, और मैं इस शून्य को स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ।"
बाबा रणधीर सिंह: (धीमी आवाज़ में) "तुम एक कठिन रास्ते पर हो, भगत।"
भगत सिंह: "क्रांति की राह कभी आसान नहीं होती, बाबा। चाहे वह समाज के खिलाफ हो, या काल्पनिक भगवान के खिलाफ। आज से लोग मुझे 'नास्तिक' कहेंगे, और मुझे इस पर गर्व है, क्योंकि मेरी नास्तिकता किसी नफरत से नहीं, बल्कि तर्क और न्याय के प्रति मेरे प्यार से पैदा हुई है।
दृश्य: एक शहीद का घोषणापत्र
स्थान: लाहौर सेंट्रल जेल, कालकोठरी नंबर 14।
समय: आधी रात। सन्नाटे में केवल संतरी के जूतों की आहट सुनाई दे रही है।
(भगत सिंह ठंडी जमीन पर बिछी एक पतली चटाई पर बैठे हैं। एक छोटा लकड़ी का तख्ता उनकी मेज का काम कर रहा है। उनके पास सरकारी कागज़ के कुछ पन्ने और एक फाउंटेन पेन है। वे टिमटिमाती मोमबत्ती को देखते हैं, फिर अपनी कलम को दवात में डुबोते हैं। उनके मन में कोई हिचकिचाहट नहीं है; ये विचार महीनों से उनके मस्तिष्क में सुलग रहे थे।)
भगत सिंह: (पार्श्व स्वर/विचार)
"एक नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ है। क्या मेरे अहंकार के कारण मैं उस सर्वव्यापी, सर्वज्ञानी और सर्वशक्तिमान ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करता? मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि मुझे ऐसे सवाल का सामना करना पड़ेगा।"
(वे बड़े और स्पष्ट अक्षरों में शीर्षक लिखते हैं: "मैं नास्तिक क्यों हूँ"। वे रुकते हैं, 'नास्तिक' शब्द को ऐसे देखते हैं जैसे वह कोई सम्मान का पदक हो।)
भगत सिंह: (लिखते हुए)
"चलो देखते हैं। मुझे बताया गया है कि मैं नास्तिक इसलिए हूँ क्योंकि मैं एक 'प्रसिद्ध व्यक्ति' हूँ, क्योंकि मेरा नाम लाखों लोगों की जुबान पर है। वे कहते हैं कि मैं इतना अभिमानी हो गया हूँ कि झुक नहीं सकता। लेकिन वे उस अध्ययन, उस संघर्ष और उन आंसुओं को नहीं देखते जो इस 'अभिमान' तक ले गए।"
(वे आगे झुकते हैं, मोमबत्ती की लौ से उनका चेहरा चमक रहा है। वे अब और तेज़ी से लिखते हैं, कागज़ पर कलम चलने की आवाज़ गूँज रही है।)
"मैं पूछता हूँ: तुम्हारे 'ईश्वर' ने इस दुनिया को क्यों बनाया, जो कि वास्तव में एक नर्क है, जहाँ निरंतर और कड़वा दुख है? उसने इंसान को भोजन की इच्छा के साथ क्यों पैदा किया और फिर उसे खाने के लिए अनाज क्यों नहीं दिया? यदि वह सबका पिता है, तो वह अपने ऊँचे स्वर्ग में बैठकर अपने बच्चों को अंग्रेजों के हाथों कत्ल होते हुए क्यों देखता है?"
(वे एक पल के लिए रुकते हैं, अपनी कोठरी की लोहे की सलाखों को देखते हैं। वे जानते हैं कि उनके पास जीवित रहने के लिए केवल कुछ ही दिन बचे हैं। एक सामान्य व्यक्ति शायद किसी 'रक्षक' या 'मसीहा' की शरण लेता, लेकिन सिंह कलम पर अपनी पकड़ और मजबूत कर लेते हैं।)
"नहीं। मैं किसी काल्पनिक साये से मदद नहीं मांगूँगा। जो भी व्यक्ति प्रगति के लिए खड़ा है, उसे पुराने विश्वास के हर पहलू की आलोचना करनी होगी। उसे प्रचलित धारणा की हर सीमा को चुनौती देनी होगी। अंधविश्वास मन को कमजोर करता है; संदेह उसे शक्ति देता है।"
(वे पन्ने पर अपने हस्ताक्षर करते हैं। वे कोने में रखी किताबों—डार्विन, मार्क्स, रूसो—के ढेर को देखते हैं। उन्हें एहसास है कि उनका जीवन एक बलिदान है, लेकिन उनके विचार आने वाली पीढ़ियों की विरासत होंगे।)
"मैं फांसी के फंदे की ओर जा रहा हूँ। मैं समाप्त होने जा रहा हूँ। कुछ ही क्षणों में मेरा जीवन समाप्त हो जाएगा, और मेरा इंतजार करने के लिए कोई स्वर्ग नहीं है। लेकिन मैं संतुष्ट हूँ। मैं संतुष्ट हूँ क्योंकि मैं एक महान उद्देश्य के लिए जिया, और मैं उस सत्य के लिए मरा जिसे मैंने खुद खोजा था।"
(वे स्याही सुखाने के लिए कागज़ पर फूंक मारते हैं। वे एक सेकंड के लिए अपनी आँखें बंद करते हैं, प्रार्थना में नहीं, बल्कि शांति में। वे कलम नीचे रख देते हैं। दृश्य धुंधला होता है और मोमबत्ती बुझ जाती है, उन्हें पूर्ण अंधकार में छोड़ देती है—एक ऐसा अंधकार जिससे उन्हें अब डर नहीं लगता।)
विरासत
यह निबंध जेल से बाहर तस्करी करके निकाला गया और उनकी फांसी के कुछ महीने बाद 27 सितंबर, 1931 को प्रकाशित हुआ। यह भारतीय बौद्धिक इतिहास के सबसे शक्तिशाली दस्तावेजों में से एक है, जो यह साबित करता है कि भगत सिंह केवल कार्रवाई के व्यक्ति नहीं थे, बल्कि गहरे चिंतन के व्यक्ति भी थे।