यह अरावली पर्वतमाला की महागाथा है—सिर्फ चट्टानों का एक समूह नहीं, बल्कि एक ऐसा जीवंत नायक जिसने उपमहाद्वीप के जन्म, साम्राज्यों के उदय और पतन, और पृथ्वी पर जीवन के विकास को अपनी आँखों से देखा है।
1. पृथ्वी का ज्येष्ठ पुत्र: शिखरों का जन्म
इससे पहले कि हिमालय पृथ्वी के मानस पटल पर एक विचार के रूप में भी आया था, इससे पहले कि डायनासोर मैदानों में दहाड़ते थे, अरावली का अस्तित्व था।
लगभग 1.8 अरब साल पहले, पृथ्वी एक धधकती हुई भट्टी के समान थी। उस कालखंड में, जिसे 'प्रोटरोज़ोइक ईऑन' (Proterozoic Eon) कहा जाता है, टेक्टोनिक प्लेटें आपस में टकराने लगीं। भूमि के विशाल टुकड़ों की इस धीमी लेकिन भीषण टक्कर से धरती की ऊपरी परत मुड़ गई और ऊपर उठने लगी। अत्यधिक दबाव और गर्मी ने मिट्टी को 'स्लेट' में और रेत को 'क्वाटज़ाइट' में बदल दिया।
उस समय अरावली किसी विशालकाय दैत्य के नुकीले दांतों की तरह उभरी थी, जो आज के हिमालय से भी कहीं ऊँची और दुर्जेय थी। अपनी युवावस्था में, ये बर्फीली चोटियाँ वर्तमान दिल्ली से लेकर अरब सागर के तटों तक फैली हुई थीं। इन्हें 'ओल्ड फोल्ड माउंटेन्स' (पुराने वलित पर्वत) कहा गया—एक युवा महाद्वीप की रीढ़।
2. समय की मार: धैर्य का एक पाठ
समय एक निष्ठुर मूर्तिकार है। करोड़ों वर्षों तक हवा, बारिश और सूरज ने अरावली पर अपना प्रहार किया। जहाँ अन्य पर्वत श्रृंखलाएं बनीं और मिट गईं, अरावली अपनी जगह डटी रही, भले ही वह धीरे-धीरे घिसती चली गई।
जब गोंडवाना महाद्वीप टूटने लगा, तब तक अरावली ऊँची चोटियों से बदलकर एक ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी श्रृंखला में तब्दील हो चुकी थी। इसने एक नया रूप धारण किया: एक रक्षक का रूप। इसके पश्चिम में थार रेगिस्तान की फैलती हुई रेत थी। अरावली ने एक 'थर्मल रेगुलेटर' (तापमान नियंत्रक) के रूप में काम किया। इसने मानसून की हवाओं को रोककर उत्तर भारत के मैदानों में बारिश कराई और साथ ही एक ढाल बनकर रेगिस्तान को उपजाऊ भूमि निगलने से रोका।
3. सभ्यता का पालना
जैसे ही मानव इतिहास का उदय हुआ, अरावली केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं रही, बल्कि एक शरणस्थली बन गई।
* पाषाण युग: अरावली की गुफाओं में आदिमानव ने अपने औजार और चित्र छोड़े। इन पहाड़ियों ने हथियारों के लिए पत्थर और पीने के लिए बारहमासी झरने दिए।
* ताम्र युग: इन पहाड़ियों की नसों में एक रहस्य छिपा था: तांबा। आहड़-बनास संस्कृति और सिंधु घाटी सभ्यता के लोग धातुओं के लिए अरावली की ओर देखते थे। खेतड़ी की खदानें प्राचीन भारत का औद्योगिक हृदय थीं।
4. राजपूत शौर्य: पत्थर का किला
मध्यकाल में अरावली राजपूतों के अदम्य साहस का प्रतीक बन गई। इसकी दुर्गम घाटियाँ और ऊँची चट्टानें योद्धा संस्कृति के लिए सबसे सुरक्षित ठिकाना थीं।
इन पहाड़ों ने केवल किलों के लिए पत्थर ही नहीं दिए, बल्कि ये पहाड़ खुद एक किला थे।
* चित्तौड़गढ़ एक चट्टान पर पत्थर के जहाज की तरह खड़ा था।
* कुंभलगढ़, जिसकी 36 किलोमीटर लंबी दीवार दुनिया की दूसरी सबसे लंबी दीवार है, अरावली की चोटियों पर एक अजगर की तरह लिपटी थी।
* हल्दीघाटी, अरावली का एक संकरा दर्रा, महाराणा प्रताप और मुगल सेना के बीच ऐतिहासिक युद्ध का गवाह बना। यहाँ की पीली मिट्टी खून से लाल हो गई, और ये पहाड़ प्रतिरोध का प्रतीक बन गए।
5. आधुनिक संकट: खतरे में एक विशाल विरासत
आज, अरावली की कहानी एक दुखद मोड़ पर है। जो पहाड़ दो अरब वर्षों के भूगर्भीय उथल-पुथल से बच गए, वे अब मानवीय लालच का सामना कर रहे हैं।
* खनन: जो क्वार्टजाइट और संगमरमर इन पहाड़ियों को सुंदर बनाते हैं, वही इनके लिए अभिशाप बन गए हैं। अवैध खनन ने पूरी की पूरी पहाड़ियों को समतल कर दिया है।
* शहरीकरण: गुरुग्राम और दिल्ली जैसे शहर अरावली की गोद में फैलते जा रहे हैं। उत्तर भारत के इन 'फेफड़ों' का दम घोंटा जा रहा है।
* रेगिस्तान का बढ़ना: जैसे-जैसे पहाड़ियाँ गायब हो रही हैं, अरावली के बीच के 'गैप' चौड़े हो रहे हैं। इससे थार रेगिस्तान की रेत दिल्ली की ओर बढ़ रही है, जिससे धूल भरी आंधियां और तापमान बढ़ रहा है।
निष्कर्ष: पहाड़ियों की आत्मा
घावों के बावजूद, अरावली आज भी जैव विविधता का खजाना है। यह झालाना के तेंदुओं, बिज्जू और प्रवासी पक्षियों का घर है। माउंट आबू जैसे स्थानों पर, जहाँ गुरु शिखर सबसे ऊँची चोटी है, हवा आज भी ठंडी है और दिलवाड़ा के प्राचीन मंदिर मानवीय कला और पर्वत की भव्यता के मिलन का प्रमाण हैं।
अरावली की कहानी हमें याद दिलाती है कि कुछ भी स्थायी नहीं है, फिर भी कुछ चीजें अविश्वसनीय रूप से लचीली होती हैं। यह भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे पुरानी जीवित गवाह है—इस धरती की हर धड़कन की साक्षी।