झारखंड का एकमात्र जिला जहाँ गंगा नदी बहती है

झारखंड का एकमात्र जिला जहाँ गंगा नदी बहती है

यह साहिबगंज की कहानी है—झारखंड का वह एकमात्र कोना जहाँ गंगा अपनी लहरों की चादर बिछाती है। यहाँ की सुबह सूरज के उगने से नहीं, बल्कि कोहरे और लहरों के बीच एक समझौते से शुरू होती है।
झारखंड की पहचान उसकी पथरीली चट्टानों, घने साल के जंगलों और खनिज से भरी धरती से है। यह लाल मिट्टी और लोहे जैसे इरादों वाली भूमि है। लेकिन इसके उत्तर-पूर्वी छोर पर, राजमहल की पहाड़ियाँ ममतामयी गंगा के सामने झुक जाती हैं, जिससे यह पवित्र नदी झारखंड की मिट्टी को लगभग 80 किलोमीटर तक सहलाते हुए गुजरती है।
पेश है साहिबगंज की दास्तान, जिसे "साहबों का शहर" कहा जाता है, जहाँ पत्थर हिमालय से भी पुराने हैं और पानी में करोड़ों आत्माओं की प्रार्थनाएँ बहती हैं।
प्राचीन प्रहरी: राजमहल की पहाड़ियाँ
इससे पहले कि इस धरती पर पहला इंसान कदम रखता, यहाँ की जमीन आग से दहक रही थी। राजमहल ट्रैप्स—वे ज्वालामुखी पहाड़ियाँ जो इस शहर को गोद में लिए हुए हैं—जुरासिक काल का एक भूवैज्ञानिक दस्तावेज हैं। यदि आप आज इन पहाड़ियों पर चलते हैं, तो आप केवल मिट्टी पर नहीं, बल्कि दिग्गजों के कब्रिस्तान पर चल रहे होते हैं। लाखों साल पुराने पौधों के जीवाश्म (Fossils) आज भी इन पत्थरों में उकेरे हुए मिलते हैं, जो हमें याद दिलाते हैं कि साहिबगंज सृष्टि के आरंभ का गवाह रहा है।
जैसे ही गंगा बिहार से झारखंड में प्रवेश करती है, ये पहाड़ियाँ एक मौन प्रहरी की तरह खड़ी हो जाती हैं। अन्य स्थानों पर गंगा अपना मार्ग बदलती रहती है, लेकिन यहाँ राजमहल के बेसाल्ट पत्थरों ने उसे एक मजबूत सीमा दी है। नदी यहाँ सिमटती है, गहरी होती है और एक राजसी मोड़ लेती है। भूगोल की इसी विशेषता ने साहिबगंज को केवल एक सुंदर शहर ही नहीं, बल्कि एक अभेद्य किला बना दिया।
साम्राज्यों का प्रवेश द्वार
इतिहास हमेशा वहीं बहता है जहाँ पानी का रास्ता होता है। पहाड़ियों और नदी के बीच एक संकरी पट्टी होने के कारण, साहिबगंज को "बंगाल का प्रवेश द्वार" (तेलियागढ़ी दर्रा) कहा जाने लगा।
कल्पना कीजिए हज़ारों घोड़ों की टापों की गूँज की। जिस किसी राजा को बंगाल की संपत्ति पर कब्ज़ा करना होता था, उसे इस 'सुई की नोक' जैसे रास्ते से गुजरना ही पड़ता था। मुगलों को यह पता था, अफगानों को यह पता था और अंग्रेजों को इसकी लालसा थी।
 * शेरशाह सूरी ने दिल्ली के सिंहासन पर नज़र रखते हुए इन्हीं तटों पर चहलकदमी की थी।
 * अकबर के सेनापतियों ने मानसून के कीचड़ में यहाँ खूनी जंग लड़ी थी।
 * 1855 का संथाल विद्रोह, जिसका नेतृत्व अमर शहीद सिद्धू और कान्हू ने किया था, पास के ही भोगनाडीह गाँव से भड़का था। साहिबगंज की पहाड़ियों में नगाड़ों की थाप गूँजी थी जब स्थानीय आदिवासियों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के दमन के खिलाफ तीर-धनुष उठाए थे।
नदी ने यह सब देखा। उसने गिरे हुए लोगों के लहू को धोया और विजेताओं के जहाजों को सहारा दिया। वह तलवार से लेकर भाप के इंजन तक के सफर की खामोश गवाह बनी।
ब्रिटिश छाप और स्टीम इंजन की सीटी
जब अंग्रेज आए, तो उन्होंने साहिबगंज को एक आध्यात्मिक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि एक रणनीतिक केंद्र (Strategic Hub) के रूप में देखा। उन्होंने 'लूप लाइन' रेलवे बनाई जिसने कलकत्ता को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ा।
शहर की सूरत बदल गई। ऊँची छतों और लाल खपरैलों वाले आलीशान बंगले नदी के किनारे उगने लगे। रेलवे के 'साहबों' (अधिकारियों) के कारण ही इस जगह का नाम साहिबगंज पड़ा। यहाँ की हवा, जिसमें कभी केवल गीली मिट्टी और चमेली की खुशबू थी, अब भाप के इंजनों के कोयले के धुएं से भर गई। साहिबगंज एक व्यस्त बंदरगाह और रेलवे का केंद्र बन गया।
यहाँ का सेंट मैरी चर्च आज भी उस दौर की याद दिलाता है, जिसकी घंटियाँ उस शहर के ऊपर बजती थीं जो बंगाली बुद्धिजीवियों, बिहारी जज्बे और आदिवासी जीवंतता का संगम बनता जा रहा था।
घाटों का जीवन: शहर की आत्मा
साहिबगंज में रहने का अर्थ है गंगा के घाटों की लय के साथ जीना। बिजली घाट हो या मनिहारी घाट, यहाँ की दुनिया रंगीन है। सुबह की पहली किरण से पहले ही मंदिरों की घंटियाँ बजने लगती हैं। पंडे अपनी लकड़ी की चौकियों पर विशाल छतरियाँ लगाकर बैठ जाते हैं।
लेकिन साहिबगंज का गंगा के साथ रिश्ता बनारस या हरिद्वार से थोड़ा अलग है। यहाँ यह अधिक आत्मीय है और धार्मिक व्यवसाय के बोझ से मुक्त है। यह एक कामकाजी नदी है। आप मछुआरों को छोटी लकड़ी की नौकाओं से जाल फेंकते देखेंगे। आप बड़े-बड़े फेरियों (Ferry) को देखेंगे जो ट्रकों, मवेशियों और हजारों लोगों को बिहार के मनिहारी तक ले जाती हैं।
यहाँ नदी इतनी चौड़ी है कि मानसून के दौरान दूसरा किनारा दिखाई नहीं देता। वह मटमैले पानी का एक समुद्र बन जाती है। जब गंगा उफनती है, तो शहर अपनी सांसें रोक लेता है। और जब वह पीछे हटती है, तो अपने पीछे वह उपजाऊ सिल्ट (मिट्टी) छोड़ जाती है जो राजमहल के बगीचों को जीवन देती है।
आधुनिक धड़कन और शाश्वत प्रवाह
आज साहिबगंज बदलाव के दौर से गुजर रहा है। यह अब केवल एक औपनिवेशिक अवशेष या पुराना दर्रा नहीं है। 'मल्टी-मॉडल टर्मिनल' और गंगा पर बन रहे विशाल पुल के साथ, यह शहर फिर से एक 'प्रवेश द्वार' के रूप में अपनी पहचान बना रहा है।
फिर भी, ट्रकों के शोर और कंक्रीट की प्रगति के बावजूद, शहर की आत्मा पानी से जुड़ी हुई है। शाम को साहिबगंज के युवा नदी के किनारे जमा होते हैं। वे घाटों पर बैठकर मोबाइल चलाते हैं, लेकिन बार-बार सिर उठाकर उस सूर्यास्त को देखते हैं जो गंगा को पिघले हुए सोने की नदी में बदल देता है।
वे जानते हैं कि झारखंड के बाकी हिस्सों को क्या नसीब नहीं—जुलाई की उमस भरी रात में नदी की ठंडी हवा का अहसास। वे पानी की लहरों का पत्थरों से टकराने वाला संगीत जानते हैं, जो तब से नहीं बदला जब यहाँ डायनासोर घूमते थे या जब यहाँ मुगलों का राज था।
जैसे ही सूरज राजमहल की पहाड़ियों के पीछे छिपता है, साहिबगंज एक जानी-पहचानी गुनगुनाहट में डूब जाता है। शाम की आरती शुरू होती है। जलते हुए दीयों वाली छोटी नावों को पानी में छोड़ दिया जाता है।
हर दीया एक मन्नत है, एक याद है या एक प्रार्थना। वे पुराने राजमहल किले के खंडहरों से होते हुए, आधुनिक रेलवे पटरियों के पास से गुजरते हुए, विशाल नदी के अंधेरे विस्तार में बह जाते हैं। साहिबगंज एक सुंदर विरोधाभास बना हुआ है—जहाँ झारखंड की कठोर पहाड़ियों का साहस और माँ गंगा की शाश्वत कृपा एक दूसरे में समा जाते हैं।

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