भारत के इतिहास में साल 1600 एक ऐसा मोड़ था जिसने न केवल भारतीय उपमहाद्वीप बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति और भूगोल को बदलकर रख दिया। यह वह वर्ष था जब लंदन के कुछ साहसी व्यापारियों ने मिलकर एक ऐसी कंपनी की नींव रखी, जो भविष्य में दुनिया की सबसे शक्तिशाली 'निजी सेना' और 'शासक' बनने वाली थी।
16वीं शताब्दी के अंत तक, पुर्तगालियों और डचों ने मसालों के व्यापार पर कब्जा कर लिया था। उनकी सफलता को देखकर लंदन के व्यापारियों के एक समूह, जिन्हें 'एडवेंटरर्स' कहा जाता था, ने रानी एलिजाबेथ प्रथम से पूर्व के साथ व्यापार करने के लिए एकाधिकार (Monopoly) मांगा।
31 दिसंबर, 1600 को रानी ने एक रॉयल चार्टर पर हस्ताक्षर किए, जिससे 'गवर्नर एंड कंपनी ऑफ मर्चेंट्स ऑफ लंदन ट्रेडिंग इनटू द ईस्ट इंडीज' को अगले 15 वर्षों के लिए पूर्व के साथ व्यापार करने का विशेष अधिकार मिल गया।
कंपनी का पहला जहाज 'हेक्टर', जिसका नेतृत्व कैप्टन विलियम हॉकिन्स कर रहे थे, 1608 में गुजरात के सूरत बंदरगाह पर पहुंचा। हॉकिन्स मुगल बादशाह जहांगीर के दरबार में गए। उन्हें तुर्की भाषा आती थी, जिससे वे बादशाह को प्रभावित करने में सफल रहे, लेकिन पुर्तगालियों के षड्यंत्र के कारण उन्हें शुरुआत में व्यापारिक रियायतें नहीं मिल सकीं।
अंततः, 1615 में किंग जेम्स प्रथम के राजदूत सर थॉमस रो जहांगीर के दरबार में पहुंचे और सूरत में एक कारखाना (Factory) स्थापित करने का आधिकारिक फरमान प्राप्त करने में सफल रहे।
शुरुआत में ब्रिटिश केवल मसालों, रेशम, सूती कपड़े और नील के व्यापार में रुचि रखते थे। उन्होंने धीरे-धीरे भारत के तटों पर अपने पैर जमाए:
मद्रास (1639): सेंट जॉर्ज किले की स्थापना।
बंबई (1668): पुर्तगालियों ने इसे दहेज के रूप में किंग चार्ल्स द्वितीय को दिया था, जिन्होंने इसे कंपनी को किराए पर दे दिया।
कलकत्ता (1690): जॉब चार्नॉक ने सुतानाती, गोविंदपुर और कलिकाता गांवों को मिलाकर इसकी नींव रखी।
18वीं शताब्दी के मध्य तक मुगल साम्राज्य कमजोर हो चुका था। कंपनी ने इस अवसर का लाभ उठाया।
प्लासी का युद्ध (1757): रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में कंपनी ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हराया। यह भारत में ब्रिटिश शासन की पहली राजनीतिक नींव थी।
बक्सर का युद्ध (1764): इस युद्ध में मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय, अवध के नवाब और मीर कासिम की संयुक्त सेना को हराकर कंपनी ने 'दीवानी अधिकार' (टैक्स वसूलने का अधिकार) प्राप्त कर लिया।
ब्रिटिश कंपनी की नीतियां पूरी तरह से लाभ पर केंद्रित थीं, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा:
धन का निष्कासन (Drain of Wealth): भारत का कच्चा माल कम दाम पर इंग्लैंड भेजा जाता था और वहां से तैयार माल ऊंचे दामों पर वापस भारत लाया जाता था।
भू-राजस्व प्रणालियां: 'स्थायी बंदोबस्त' (Permanent Settlement) और 'रैयतवाड़ी' जैसी प्रणालियों ने किसानों को कर्ज के बोझ तले दबा दिया।
साम्राज्य विस्तार: लॉर्ड वेलेजली की 'सहायक संधि' (Subsidiary Alliance) और लॉर्ड डलहौजी की 'व्यपगत का सिद्धांत' (Doctrine of Lapse) के माध्यम से कई भारतीय रियासतों (जैसे झाँसी, अवध) को हड़प लिया गया।
1857 में भारतीय सैनिकों (सिपाहियों) ने कंपनी के कुशासन और धार्मिक हस्तक्षेप के खिलाफ विद्रोह कर दिया। हालांकि यह विद्रोह सफल नहीं रहा, लेकिन इसने लंदन में ब्रिटिश सरकार को हिला दिया।
1858 में ब्रिटिश संसद ने 'भारत सरकार अधिनियम' पारित किया, जिसके तहत:
ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त कर दिया गया।
भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन (महारानी विक्टोरिया) के हाथों में चला गया।
गवर्नर-जनरल को अब 'वायसराय' कहा जाने लगा।
ईस्ट इंडिया कंपनी का इतिहास शोषण का रहा है, लेकिन उसने अनजाने में कुछ ऐसी व्यवस्थाएं छोड़ीं जिसने आधुनिक भारत को आकार दिया:
रेलवे और टेलीग्राफ: व्यापारिक और सैन्य लाभ के लिए शुरू की गई ये सेवाएं बाद में भारत की जीवन रेखा बनीं।
प्रशासनिक ढांचा: भारतीय सिविल सेवा (ICS) की नींव कंपनी के काल में ही रखी गई थी।
शिक्षा: 1835 के मैकाले मिनट ने भारत में अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार किया।
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की कहानी दुनिया के इतिहास की सबसे अनोखी कहानियों में से एक है—कैसे एक छोटी सी व्यापारिक कंपनी ने अपनी चालाकी, सैन्य शक्ति और फूट डालो राज करो की नीति से एक महान उपमहाद्वीप को गुलाम बना लिया। यह भारत के लिए एक ऐसा कालखंड था जिसने हमारी अर्थव्यवस्था को तोड़ा, लेकिन साथ ही एक आधुनिक राष्ट्र की चेतना को भी जन्म दिया।