जब हम भारत में यूरोपीय शक्तियों के आगमन की बात करते हैं, तो पुर्तगाली, डच, ब्रिटिश और फ्रांसीसियों का शोर इतना अधिक है कि डेनमार्क (Danish) की उपस्थिति अक्सर इतिहास के पन्नों में दब जाती है। डैनिश लोग भारत में बहुत बड़े साम्राज्य की लालसा लेकर नहीं आए थे, लेकिन उनकी उपस्थिति ने भारत के शैक्षिक और सांस्कृतिक परिदृश्य पर एक अमिट छाप छोड़ी।
डच और ब्रिटिश कंपनियों की शुरुआती सफलता को देखते हुए, डेनमार्क के राजा क्रिश्चियन चतुर्थ ने 1616 में पहली 'डैनिश ईस्ट इंडिया कंपनी' को एक रॉयल चार्टर प्रदान किया। उनका उद्देश्य पूर्व के साथ मसालों के व्यापार में अपनी हिस्सेदारी सुरक्षित करना था।
हालांकि, डैनिश अभियान दल को भारत पहुँचने में काफी संघर्ष करना पड़ा। लंबी समुद्री यात्रा और खराब मौसम के बाद, वे अंततः भारत के पूर्वी तट पर पहुँचे।
डैनिश लोगों ने भारत के पूर्वी तट पर दो मुख्य बस्तियां बसाईं, जो उनके व्यापार और मिशनरी गतिविधियों के केंद्र बने:
ट्रांक्यूबार (Tranquebar - तरंगमबाड़ी): 1620 में, डैनिश कमांडर ओवे गेड ने तंजौर के नायक शासक के साथ एक संधि की और तमिलनाडु के तट पर 'तरंगमबाड़ी' (लहरों के संगीत का स्थान) में अपनी पहली बस्ती बसाई। यहाँ उन्होंने 'फोर्ट डैन्सबोर्ग' (Fort Dansborg) का निर्माण किया, जो आज भी डेनमार्क के बाहर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा डैनिश किला है।
सेरामपुर (Serampore): 1755 में, उन्होंने बंगाल में हुगली नदी के तट पर सेरामपुर में अपनी दूसरी महत्वपूर्ण बस्ती बसाई, जिसे उन्होंने 'फ्रेड्रिकनगर' नाम दिया।
डैनिश व्यापारियों ने मुख्य रूप से सूती कपड़े, नील (Indigo), अफीम और मसालों का व्यापार किया। चूंकि उनकी सैन्य शक्ति अंग्रेजों या डचों के मुकाबले बहुत कम थी, इसलिए वे अक्सर एक 'न्यूट्रल' (तटस्थ) शक्ति के रूप में काम करते थे। जब अन्य यूरोपीय शक्तियां आपस में युद्ध कर रही होती थीं, तब डैनिश जहाज सुरक्षित रूप से माल पहुँचाने का काम करते थे।
डैनिश काल की सबसे बड़ी उपलब्धि व्यापार नहीं, बल्कि शिक्षा और प्रिंटिंग थी।
पहली प्रिंटिंग प्रेस: 1706 में, डैनिश मिशनरी बार्थोलोम्यूज ज़िगेंबल्ग (Bartholomäus Ziegenbalg) ट्रांक्यूबार आए। उन्होंने वहां भारत की पहली प्रमुख प्रिंटिंग प्रेस स्थापित की और तमिल भाषा में बाइबिल का अनुवाद मुद्रित किया।
सेरामपुर त्रयी (Serampore Trio): विलियम कैरी, जोशुआ मार्शमैन और विलियम वार्ड जैसे विद्वानों ने सेरामपुर को भारतीय पत्रकारिता और आधुनिक शिक्षा का केंद्र बना दिया।
सेरामपुर कॉलेज (1818): यह एशिया का सबसे पुराना आधुनिक डिग्री प्रदान करने वाला कॉलेज है, जिसे डैनिश राजा द्वारा चार्टर प्रदान किया गया था।
डैनिश कंपनी को कई बार वित्तीय संकटों का सामना करना पड़ा। नेपोलियन के युद्धों के दौरान डेनमार्क की स्थिति खराब हो गई और अंग्रेजों ने भारत में अपनी स्थिति इतनी मजबूत कर ली थी कि छोटी कंपनियों के लिए टिकना मुश्किल था।
अंततः, 1845 में डेनमार्क ने अपनी सभी भारतीय बस्तियाँ (ट्रांक्यूबार और सेरामपुर) ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को 12.5 लाख रुपये में बेच दीं और भारत से हमेशा के लिए विदा हो गए।
डैनिश ईस्ट इंडिया कंपनी का इतिहास युद्धों और विजयों का नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण व्यापार और ज्ञान के प्रसार का है। आज भी ट्रांक्यूबार की गलियों में डैनिश वास्तुकला की झलक मिलती है, जो हमें उस समय की याद दिलाती है जब स्कैंडिनेवियाई व्यापारियों ने बंगाल और तमिलनाडु के तटों पर अपने सपने बुने थे।