18वीं शताब्दी की शुरुआत में, 'ओस्टेंड' (जो अब बेल्जियम में है) के बंदरगाह शहर के व्यापारियों ने देखा कि डच और ब्रिटिश कंपनियां पूर्व के व्यापार से असीमित धन कमा रही हैं। उस समय बेल्जियम का यह क्षेत्र ऑस्ट्रिया के हैब्सबर्ग साम्राज्य के अधीन था।
1722 में, पवित्र रोमन सम्राट चार्ल्स छठे (Charles VI) ने 'ओस्टेंड कंपनी' को आधिकारिक चार्टर प्रदान किया। इसे डच और ब्रिटिश व्यापारिक एकाधिकार को सीधी चुनौती के रूप में देखा गया।
ओस्टेंड कंपनी के जहाज बंगाल के उपजाऊ तटों की ओर आकर्षित हुए। उन्होंने भारत में दो मुख्य केंद्र स्थापित किए:
बाँकीबाज़ार (Bankibazar): यह हुगली नदी के तट पर, कलकत्ता के पास स्थित था। यह उनका मुख्य व्यापारिक केंद्र और किला बना।
कोवलम (Covelong): मद्रास (चेन्नई) के पास कोरोमंडल तट पर उन्होंने एक और फैक्ट्री स्थापित की।
डैनिश और स्वीडिश कंपनियों की तरह, ओस्टेंड कंपनी का मुख्य ध्यान चाय, रेशम, मखमल और मसालों पर था।
ओस्टेंड कंपनी को शुरुआती वर्षों में आश्चर्यजनक सफलता मिली। उनके जहाजों द्वारा लाया गया माल यूरोप के बाजारों में बहुत कम कीमत पर और अच्छी गुणवत्ता के साथ बिकने लगा। उनकी इस सफलता ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और डच ईस्ट इंडिया कंपनी (VOC) की रातों की नींद उड़ा दी।
अंग्रेजों और डचों को डर था कि अगर इस 'नई कंपनी' को नहीं रोका गया, तो यह उनके व्यापारिक साम्राज्य के लिए बड़ा खतरा बन जाएगी।
ओस्टेंड कंपनी को युद्ध के मैदान में हराना मुश्किल था, इसलिए अंग्रेजों और डचों ने कूटनीति का सहारा लिया। उन्होंने सम्राट चार्ल्स छठे पर दबाव बनाया।
उस समय चार्ल्स छठे की कोई पुरुष संतान नहीं थी और वे चाहते थे कि उनकी बेटी मारिया थेरेसा उनकी उत्तराधिकारी बने। इसे स्वीकार करने के लिए उन्हें प्रमुख यूरोपीय शक्तियों (विशेषकर ब्रिटेन और नीदरलैंड) के समर्थन की आवश्यकता थी।
1731 में, वियना की संधि के तहत, सम्राट ने अपनी बेटी के उत्तराधिकार को मान्यता दिलाने के बदले ओस्टेंड कंपनी को बंद करने का समझौता कर लिया।
1731 में कंपनी के चार्टर को निलंबित कर दिया गया और 1744 तक यह पूरी तरह से समाप्त हो गई। बंगाल के बाँकीबाज़ार में मौजूद उनके कर्मचारियों को स्थानीय नवाबों और ब्रिटिश नौसेना के संयुक्त दबाव का सामना करना पड़ा। अंततः, बेल्जियम के व्यापारियों को भारत का अपना सपना छोड़कर वापस लौटना पड़ा।
ओस्टेंड कंपनी का इतिहास भले ही केवल 9-10 वर्षों का रहा हो, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण सबक देता है। यह दिखाता है कि 18वीं सदी के भारत में व्यापार केवल अर्थशास्त्र का विषय नहीं था, बल्कि वह यूरोपीय कूटनीति और राजनीति से गहराई से जुड़ा हुआ था।
आज बाँकीबाज़ार (पश्चिम बंगाल) में उस अल्पकालिक बेल्जियम प्रभाव के अवशेष ढूंढना मुश्किल है, लेकिन इतिहास के दस्तावेजों में यह कंपनी एक ऐसी 'चिंगारी' के रूप में दर्ज है जिसने वैश्विक शक्तियों के बीच खलबली मचा दी थी।
ओस्टेंड कंपनी की कहानी एक 'असफल' लेकिन 'प्रतिभाशाली' प्रयास की कहानी है। यह हमें याद दिलाती है कि भारत की धरती पर केवल बड़ी सेनाओं ने ही नहीं, बल्कि यूरोप के छोटे-छोटे कोनों से आए साहसी व्यापारियों ने भी अपनी किस्मत आजमाने की कोशिश की थी।