जब ओस्टेंड कंपनी (बेल्जियम) को कूटनीतिक दबाव के कारण बंद कर दिया गया, तब उन अनुभवी व्यापारियों और नाविकों ने स्वीडन का रुख किया। 14 जून, 1731 को स्वीडन के राजा फ्रेडरिक प्रथम ने इस कंपनी को शाही चार्टर प्रदान किया।
कंपनी का मुख्यालय स्वीडन के गोथेनबर्ग (Gothenburg) शहर में था। दिलचस्प बात यह है कि इस कंपनी के पास व्यापार करने का अधिकार तो था, लेकिन इसे अपनी रक्षा खुद करनी थी और इसे स्वीडन के बाहर कोई सैन्य सहायता नहीं दी जाती थी।
स्वीडिश कंपनी की रणनीति अन्य यूरोपीय शक्तियों से बिल्कुल अलग थी। वे जानते थे कि वे ब्रिटिश या डच नौसेना का मुकाबला नहीं कर सकते। इसलिए:
कोई क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा नहीं: उन्होंने भारत में जमीन कब्जाने या किले बनाने की कोशिश नहीं की।
तटस्थता (Neutrality): जब अंग्रेज और फ्रांसीसी आपस में लड़ रहे थे, स्वीडिश जहाज तटस्थ रहकर अपना व्यापार जारी रखते थे।
तस्करी और पुनर्विक्रय: वे भारत और चीन से माल खरीदते और उसे यूरोप के अन्य हिस्सों (अक्सर इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के तटों पर) तस्करी के जरिए बेचते थे, क्योंकि वहां ब्रिटिश कंपनी का एकाधिकार था।
यद्यपि स्वीडिश कंपनी का मुख्य ध्यान चीन (कैंटन) और चाय के व्यापार पर था, लेकिन भारत उनके लिए एक महत्वपूर्ण कड़ी था।
सूरत (Surat): स्वीडिश जहाज अक्सर सूरत रुकते थे, जहाँ से वे भारतीय वस्त्र (Textiles) और मसाले खरीदते थे।
मालाबार तट: यहाँ से वे काली मिर्च और इलायची का व्यापार करते थे।
सिल्वर कार्गो: स्वीडिश जहाज भारी मात्रा में चांदी लेकर आते थे, जिसे भारतीय व्यापारी बहुत पसंद करते थे।
कंपनी की 80% से अधिक आय चाय के व्यापार से आती थी। 18वीं सदी में यूरोप में चाय की मांग इतनी बढ़ गई थी कि स्वीडिश कंपनी ने डच और ब्रिटिश कंपनियों को कड़ी टक्कर दी। उनके जहाज न केवल माल लाते थे, बल्कि वे अपने साथ वनस्पतिशास्त्रियों (Botanists) को भी ले जाते थे। महान वैज्ञानिक कार्ल लिनिअस (Carl Linnaeus) के कई शिष्य इन जहाजों पर यात्रा करते थे ताकि वे भारत और चीन के पौधों का अध्ययन कर सकें।
1731 से 1760 के बीच कंपनी ने रिकॉर्ड तोड़ मुनाफा कमाया। गोथेनबर्ग शहर की पूरी अर्थव्यवस्था और वहां की भव्य इमारतें इसी व्यापार के पैसे से बनी थीं।
लेकिन 18वीं सदी के अंत तक परिस्थितियां बदलने लगीं:
नेपोलियन के युद्ध: यूरोप में युद्धों के कारण समुद्री मार्ग असुरक्षित हो गए।
ब्रिटिश वर्चस्व: अंग्रेजों ने चाय पर टैक्स कम कर दिया, जिससे स्वीडिश कंपनी का 'तस्करी वाला मुनाफा' खत्म हो गया।
आर्थिक मंदी: 1813 में कंपनी ने अपना परिचालन बंद कर दिया और अंततः दिवालिया हो गई।
आज भी स्वीडन के गोथेनबर्ग में "ईस्ट इंडिया हाउस" (जो अब एक संग्रहालय है) इस कंपनी की याद दिलाता है। भारत के लिए उनकी विरासत सांस्कृतिक और वैज्ञानिक है। उन्होंने भारतीय वनस्पतियों और समाज के बारे में जो विस्तृत दस्तावेज और चित्र बनाए, वे आज भी ऐतिहासिक शोध का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
स्वीडिश ईस्ट इंडिया कंपनी की कहानी हमें दिखाती है कि व्यापार के लिए हमेशा बंदूकों और किलों की जरूरत नहीं होती। एक छोटी सी शक्ति भी केवल चतुराई, तटस्थता और सही बाजार की समझ (जैसे चाय और चांदी) के दम पर दुनिया के दिग्गजों को चुनौती दे सकती है।