पुराने पटना के व्यस्त हृदय में स्थित, पादरी की हवेली (जिसे सेंट मैरी चर्च के नाम से भी जाना जाता है) बिहार के औपनिवेशिक, धार्मिक और सामाजिक परिवर्तन के तीन सदियों के इतिहास का एक मूक गवाह बनकर खड़ी है। यह न केवल बिहार का सबसे पुराना चर्च है, बल्कि लचीलेपन का एक स्मारक भी है, जिसने युद्धों, भूकंपों और साम्राज्यों के उत्थान-पतन को झेला है।
चर्च की कहानी 1713 में शुरू होती है, जब कैपचिन मिशनरी पटना पहुंचे थे। उस समय बिहार व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र था और मुगल प्रभाव अभी भी स्पष्ट था। "पादरी की हवेली" का शाब्दिक अर्थ है "पादरी का निवास स्थान"। शुरुआत में यह एक छोटा चैपल था, लेकिन जैसे-जैसे ईसाई समुदाय (व्यापारी, स्थानीय धर्मांतरित और यूरोपीय अधिकारी) बढ़ता गया, एक भव्य संरचना की आवश्यकता महसूस हुई।
आज हम जो वर्तमान संरचना देखते हैं, उसे 1772 में विनीशियन वास्तुकार तिर्रेटो द्वारा डिजाइन किया गया था।
शैली: यह चर्च नियोक्लासिकल (नव-शास्त्रीय) वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
आयाम: यह 70 फीट लंबा, 40 फीट चौड़ा और 50 फीट ऊंचा है।
मुखौटा (Facade): यूरोप के अलंकृत गोथिक कैथेड्रल के विपरीत, पादरी की हवेली में ऊंचे स्तंभों और एक भव्य पेडिमेंट के साथ एक अधिक संयमित और राजसी रूप है, जो 18वीं सदी के अंत के वास्तुकला रुझानों को दर्शाता है।
परिसर के भीतर सबसे महत्वपूर्ण कलाकृतियों में से एक विशाल नींव का घंटा (Foundation Bell) है।
उपहार: इसे 1782 में नेपाल के महाराजा के पुत्र बहादुर शाह ने मिशनरियों द्वारा प्रदान की गई चिकित्सा सहायता और सद्भावना के प्रति आभार के रूप में चर्च को भेंट किया था।
प्रतीक: यह घंटा उन अंतर-सांस्कृतिक और राजनयिक संबंधों का प्रतिनिधित्व करता है जो बिहार की सीमाओं के पार भी बने हुए थे।
इस हवेली का अस्तित्व हमेशा शांतिपूर्ण नहीं रहा। यह कई ऐतिहासिक "तूफानों" के केंद्र में रहा है:
1763 की घेराबंदी: नवाब मीर कासिम और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच संघर्ष के दौरान चर्च में तोड़फोड़ की गई थी।
1857 का विद्रोह: भारतीय स्वतंत्रता के पहले युद्ध के दौरान, चर्च को काफी नुकसान पहुँचा क्योंकि पटना उपनिवेशवाद विरोधी गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र था।
1934 का भूकंप: इस विनाशकारी भूकंप ने उत्तर बिहार के अधिकांश हिस्से को तहस-नहस कर दिया था। हालांकि चर्च को भारी क्षति हुई, लेकिन इसका सावधानीपूर्वक जीर्णोद्धार किया गया, जिससे इसके मूल आयाम और स्वरूप को सुरक्षित रखा जा सका।
पादरी की हवेली के बारे में एक अल्पज्ञात लेकिन गहरा आध्यात्मिक तथ्य मदर टेरेसा से इसका जुड़ाव है। 1948 में, वह होली फैमिली अस्पताल (जो उस समय पादरी की हवेली परिसर के भीतर स्थित था) में बुनियादी चिकित्सा प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए पटना आई थीं। यहीं पर उन्होंने एक शिक्षिका से एक नर्स बनने का सफर तय किया, जिसने उन्हें कोलकाता की झुग्गियों में जीवन भर सेवा करने के लिए तैयार किया।
चर्च के आंतरिक भाग को भव्यता और शांति का अहसास कराने के लिए डिजाइन किया गया है।
| विशेषता | विवरण |
| वेदी (Altar) | 18वीं शताब्दी के अवशेषों और शास्त्रों के साथ खूबसूरती से सजाई गई। |
| बेंच (Pews) | लकड़ी का मूल काम जो दशकों के उपयोग के बाद भी सुरक्षित है। |
| शिलालेख | फर्श और दीवारों पर लैटिन और अंग्रेजी शिलालेख प्रभावशाली मिशनरियों और अधिकारियों की कब्रों को चिह्नित करते हैं। |
आज, पादरी की हवेली केवल कैथोलिक समुदाय के लिए पूजा स्थल ही नहीं है, बल्कि यह एक धरोहर स्थल भी है जो इतिहासकारों और पर्यटकों को समान रूप से आकर्षित करता है। क्रिसमस के दौरान, चर्च को खूबसूरती से रोशन किया जाता है, जो पटना के सभी धर्मों के लोगों को आकर्षित करता है और शहर की मिली-जुली संस्कृति (साझा विरासत) का प्रतीक है।
"पादरी की हवेली के पत्थर सिर्फ छत को नहीं थामे हुए हैं; वे उस बिहार की यादों को संजोए हुए हैं जो कभी दुनिया का संगम स्थल हुआ करता था।"
स्थान: पटना सिटी (गुलजारबाग के पास)।
स्थापना: 1713 (मूल), 1772 (वर्तमान संरचना)।
वास्तुकार: तिर्रेटो।
प्रमुख आकर्षण: नेपाल के राजकुमार द्वारा भेंट किया गया विशाल घंटा।