जब हम भारत में यूरोपीय शक्तियों के आगमन की चर्चा करते हैं, तो पुर्तगालियों और अंग्रेजों के बीच अक्सर डच (नीदरलैंड के निवासी) का नाम दब जाता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि 17वीं शताब्दी में डच ईस्ट इंडिया कंपनी, जिसे VOC (Vereenigde Oost-Indische Compagnie) के नाम से जाना जाता था, दुनिया की सबसे अमीर और शक्तिशाली व्यापारिक संस्था थी।
16वीं सदी के अंत में डच व्यापारियों ने महसूस किया कि अलग-अलग व्यापार करने के बजाय एकजुट होकर पुर्तगालियों का मुकाबला करना बेहतर होगा। 20 मार्च, 1602 को डच संसद ने विभिन्न व्यापारिक कंपनियों को मिलाकर 'डच ईस्ट इंडिया कंपनी' (VOC) की स्थापना की।
इस कंपनी की कुछ अनूठी विशेषताएं थीं:
दुनिया की पहली सार्वजनिक कंपनी: इसने आम लोगों को शेयर (Stocks) बेचे।
युद्ध की शक्ति: कंपनी को संधियां करने, युद्ध लड़ने और अपने सिक्के ढालने का अधिकार प्राप्त था।
एकाधिकार: इसे 'केप ऑफ गुड होप' के पूर्व में व्यापार करने का 21 साल का एकाधिकार मिला।
डचों का मुख्य लक्ष्य दक्षिण-पूर्वी एशिया (इंडोनेशिया) के 'स्पाइस आइलैंड्स' थे, लेकिन भारतीय वस्त्रों (Textiles) के बदले मसाले प्राप्त करने के लिए उन्होंने भारत में अपने व्यापारिक केंद्र स्थापित किए।
मसूलीपट्टनम (1605): आंध्र प्रदेश के तट पर डचों ने अपना पहला कारखाना (Factory) स्थापित किया।
पुलिकट (1610): यहाँ उन्होंने अपना मुख्यालय बनाया और 'गेल्ड्रिया का किला' (Fort Geldria) निर्मित किया।
चिनसुराह (1653): बंगाल में व्यापार के लिए यह उनका प्रमुख केंद्र बना।
कोचीन (1663): उन्होंने पुर्तगालियों को हराकर मालाबार तट पर कब्जा किया।
डचों ने भारत में व्यापार का एक नया मॉडल पेश किया। पुर्तगालियों के विपरीत, जिन्होंने केवल मसालों पर ध्यान दिया, डचों ने भारतीय सूती कपड़ों (Coromandel Textiles) को व्यापार का मुख्य आधार बनाया।
वे भारत से सूती कपड़ा खरीदते थे, उसे इंडोनेशिया ले जाकर मसालों के बदले बेचते थे, और फिर उन मसालों को यूरोप में ऊंचे दामों पर बेचते थे। उन्होंने सूरत, कोरोमंडल तट और बंगाल से रेशम, अफीम (Opium), और नील (Indigo) का भी भारी निर्यात किया।
डच नौसेना उस समय पुर्तगालियों से कहीं अधिक आधुनिक और तेज थी। 1605 और 1663 के बीच, डचों ने पुर्तगालियों को इंडोनेशिया, श्रीलंका और दक्षिण भारत के अधिकांश हिस्सों से खदेड़ दिया। उन्होंने 1641 में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मलक्का पर कब्जा कर लिया, जिससे पुर्तगाली साम्राज्य की कमर टूट गई।
डचों की सबसे बड़ी चुनौती ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी बनकर उभरी। जैसे-जैसे अंग्रेज भारत में शक्तिशाली हुए, दोनों के बीच संघर्ष अनिवार्य हो गया।
बेदरा का युद्ध (Battle of Bedara, 1759): बंगाल में अंग्रेजों और डचों के बीच एक निर्णायक युद्ध हुआ। इसमें अंग्रेजों (रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में) ने डचों को करारी शिकस्त दी।
प्रभाव: इस हार के बाद भारत में डचों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं खत्म हो गईं। वे केवल व्यापार तक सीमित रह गए और धीरे-धीरे अपने सभी केंद्र अंग्रेजों को सौंप दिए।
हालांकि डच शासन अंग्रेजों जितना लंबा नहीं चला, लेकिन उनके प्रभाव आज भी मौजूद हैं:
मुद्रा शास्त्र: उनके द्वारा चलाए गए 'पगोडा' सिक्के उस समय के व्यापार में बहुत प्रसिद्ध थे।
इंडो-डच वास्तुकला: कोच्चि और पुलिकट में आज भी डच कब्रें और पुरानी इमारतें देखी जा सकती हैं।
नक्शा निर्माण: डचों ने भारतीय तटों के जो सटीक नक्शे तैयार किए, वे आने वाली शताब्दियों तक उपयोग में रहे।
1799 में डच ईस्ट इंडिया कंपनी आधिकारिक रूप से भंग कर दी गई। डचों की कहानी हमें सिखाती है कि कैसे एक छोटी सी कंपनी ने केवल व्यापारिक सूझबूझ और नौसैनिक शक्ति के बल पर दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक मार्ग पर कब्जा किया था। यदि वे भारत के बजाय इंडोनेशिया को अपनी प्राथमिकता न बनाते, तो शायद भारत का इतिहास कुछ और ही होता।
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